- घर की छतों पर रखें पानी और अनाज के दानें

- आज प्रदेश में मनाया जाएगा स्पैरोडे

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LUCKNOW गगनचुम्बी इमारतों, पतंगों की डोर, इमारतों के इर्द-गिर्द फैले बिजली के तार और खेती में बढ़ते पेस्टीसाइट्स के उपयोग के चलते गोरैया का अस्तित्व संकट में आ गया है. हाल यह कि कभी हम सभी के घरों के अंदर तक चहचहाने वाली गोरैया अब विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई है. ऐसे में इन्हें बचाने की जिम्मेदारी हम लोगों की ही है. हमें एकजुट होकर इनके संरक्षण लिए प्रयास करने होंगे. लोगों को गोरैया के प्रति सजग करने के लिए शहर के जू में 20 मार्च को गोरैया दिवस मनाया जाएगा. कार्यक्रम के दौरान लोगों को गोरैया के लिए घर दिए जाएंगे. इन्हें लोग अपने घरों की बालकनी या किसी अन्य स्थान पर लगाकर उसमें गौरेया के लिए दाना-पानी रखेंगे. ताकि गोरैया वापस उनके घरों में आ जाए.

- अब नहीं सुनाई देती गोरैया की चहचहाट

चिडि़याघर में वन्यजीव चिकित्सक डॉ. उत्कर्ष शुक्ला के अनुसार पिछले तीन दशकों के दौरान गोरैया की संख्या में तेजी से कमी आई है. घर की छतों, पेड़ों की टहनियों और खेतों की मुंडेरों पर नजर आने वाली गोरैया अचानक गायब होने लगीं. गांवों में तो अभी गोरैया के दर्शन हो जाते हैं, लेकिन शहरों में गोरैया की चहचहाट की जगह अब जंगली पक्षियों की आवाजें सुनने को मिल रही हैं. पर्यावरण चक्र को पूरा करने में गोरैया की अहम भूमिका है. ऐसे में गोरैया को बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है.

- विकास की बयार में खो गई गोरैया

डॉ. उत्कर्ष शुक्ला ने बताया कि शहरों के विकास की बयार में गोरैया लुप्त हो गई हैं. पहले सिंगल स्टोरी मकान होते थे. लोगों की घरों में बाग या छोटी क्यारियां भी रहती थीं. लेकिन अब फ्लैट कल्चर आ गया है. फ्लैट्स में इतनी इतनी जगह नहीं होती कि गोरैया वहां कहीं अपना ठिकाना बना सके.

- चाइनीज मांझा से हो रहा है नुकसान

इसके अलावा शहर में उड़ने वाली पतंगों से भी गोरैया को खासा नुकसान पहुंचा है. चाइनीज मांझा भले ही राजधानी में बैन हो लेकिन इसका प्रयोग प्रतिबंध के बाद भी धड़ल्ले से हो रहा है. कई बार गोरैया इन चाइनीज मांझे में फंस कर अपना जीवन गवां देती हैं. इसके अलावा पहले शहरों में तारों का जाल भी इतना नहीं था. बिजली के तार भी उसके लिए जानलेवा बन रहे हैं. खेतों में बीजों को लेकर उड़ने वाली गोरैया के लिए पेस्टीसाइट भी हानिकारक साबित हो रहे हैं. कई रिसर्च में यह पाया गया है कि शहरों में गोरैया को जो नुकसान हो रहा है वह तो कम है लेकिन गांवों में प्रयोग होने वाला पेस्टीसाइट उनके लिए ज्यादा हानिकारक है. ऐसे में हर जगह विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुकी गोरैया को बचाने के लिए अभियान चलाया जाता है. लोगों को जागरुक किया जाता है कि वह गोरैया को बचाने के लिए उचित कदम उठाए.

कोट

गौरेया को बचाने के लिए छोटे-छोटे प्रयास ही करने हैं. घरों की छत पर पानी और अनाज का दाना डालने से उसे उन्हें बचाया जा सकता है.

डॉ. उत्कर्ष शुक्ला

डिप्टी डायरेक्टर

चिडि़याघर

बाक्स

- चिडि़याघर में पेड़ों पर बांधे गए छोटे घड़े

चिडि़याघर में पिछले साल गोरैया दिवस पर पेड़ों में घड़ा बांध कर उसमें पानी भरा गया. इसमें एक तरफ सुराख भी किया गया था जिससे इसमें गोरैया अपना घोंसला भी बना सके. इसके साथ ही घड़े के ऊपर की तरफ रखी छोटी सी मिट्टी की प्लेट में अनाज के दाने भी बिखराए गए थे. ऐसे में यहां पर खासी मात्रा में गोरैया का आना शुरू हो गया. एक बार फिर से गोरैया के प्रति लोगों को जागरुक करने के लिए चिडि़याघर और आंचलिक विज्ञान केन्द्र में कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे.