जब ब्रह्मदैत्‍य भी नहीं डरा पाया स्‍वामी विवेकानंद को

By: Molly Seth | Publish Date: Mon 04-Jul-2016 11:15:00
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जब ब्रह्मदैत्‍य भी नहीं डरा पाया स्‍वामी विवेकानंद को
स्वामी विवेकानन्द वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे। उनका वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था। उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी जो आज भी अपना काम कर रहा है। कलकत्ता के एक कुलीन बंगाली परिवार में जन्मे स्‍वामीजी बचपन से ही आध्यात्मिकता की ओर झुके हुए थे। वे रामकृष्ण देव से काफी प्रभावित थे और उन्‍हें ही अपना गुरू स्‍वीकार किया था। आइये आज हम उनकी पुण्‍यतिथि पर आपको उनके बचपन की एक प्रेणनादायक घटना के बारे में बताते हैं, जिससे पता चलता है कि वे बचपन से अदभुद प्रतिभा के धनी थे।

खेलकूद से प्‍यार
बचपन से ही बालक नरेंद्रनाथ मस्‍त और उन्‍मुक्‍त प्रवृतति के शख्‍स थे और उन्‍हें खेलकूद बहुत पसंद था। वे पढ़ाई के साथ भी खूब मसती भी करते थे। उन्‍हें पेड़ो पर चढ़ना और उन पर झूलना काफी पसंद था। एक बार जब वे महज आठ साल के थे अपने दोस्‍त के घर गए। उनके घर में चंपक का एक पेड़ लगा था। कहते हें शिव भक्‍त अपने घर में चंपक का पेड़ लगाते हैं और इत्‍तेफाक से भगवान शिव स्‍वामी जी के भी अराध्‍य थे। स्‍वामी जी को पेड़ बेहद अच्‍छा लगा और वे उस पर चढ़ कर झूला झूलने लगे।  

जब डराया ब्रह्मदैत्‍य से
वो जब पेड़ पर झूल रहे थे तो उनके हंसने बोलने की आवाजें उनके दोस्‍त के बुजुर्ग दादाजी को सुनायी दीं। दादाजी को कम दिखाई देता था पर वो आवाज से समझ गये कि पेड़ पर कोई चढ़ा है और झूल रहा है। उन्‍हें लगा कि कहीं इस सब में पेड़ की शाखों और फूलों को कोई नुकसान नहीं पहुंचे इसलिए उन्‍होंने बालक विवेकानंद को उससे उतरने के लिए कहा। उन्‍हें ये भी डर था कि अगर बच्‍चा पेड़ से गिर गया तो उसे चोट भी लग सकती है। इसलिए उन्‍होंने कहा कि वो दोबारा पेड़ पर बिलकुल ना चढ़े। इस पर स्‍वामीजी ने पूछा क्‍यों। तब ये सोच कर कि अगर बच्‍चे को किसी खतरनाक चीज से डरा दिया दिया जाए तो वो दोबारा नहीं चढ़ेगा, उन्‍होंने कहा कि इस पेड़ पर एक ब्रह्मदैत्‍य रहता है। दादाजी ने आगे कहा कि ये दैत्‍य पारदर्शी होता है और इसीलिए दिखाई नहीं देता पर पेड़ पर चढ़ने वाले की गर्दन तोड़ देता है। इस प्रकार ये सोच कर कि अब डर कर बच्‍चा पेड़ से उतर जायेगा दादाजी वापस चले गए।

Swami Vivekananda

बिना तर्क के विश्‍वास ना करने की आदत डर से बचाया
दादाजी के जाने के बाद विवेकानंद मुस्‍कराये और फिर झूलने में मगन हो गए। इस पर उनका दोस्‍त जो वहीं खड़ा सब सुन रहा था, डर गया और बोला तुम उतर क्‍यों नहीं रहे। उसने कहा क्‍या तुम्‍हें डर नहीं है कि ब्रह्मदैत्‍य तुम्‍हारी गर्दन तोड़ देगा। इस पर विवेकानंद ने कहा कि बिना सोचे किसी बात को इसलिए मत मानों क्‍योकि किसी ने उसके बारे में तुम्‍हे बताया है। उसे तर्क की कसौटी पर कसो। क्‍या तुम नहीं समझ रहे कि अगर पेड़ पर ब्रह्मदैत्‍य होता तो वो बहुत पहले मेरी गर्दन तोड़ चुका होता। तर्क पर आधारित सनातन धर्म के प्रचारक स्‍वामी विवेकानंद के बचपन की ये घटना साबित करती है कि वे बाल्‍यकाल से ही साहसी और बुद्धिमान थे।

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