Movie review : अनारकली ऑफ़ आरा, फेमिनिस्म की एक ब्रेव कहानी

By: Inextlive | Publish Date: Fri 24-Mar-2017 04:02:05   |  Modified Date: Fri 24-Mar-2017 04:50:19
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Movie review : अनारकली ऑफ़ आरा, फेमिनिस्म की एक ब्रेव कहानी
फिल्म ‘अनारकली ऑफ़ आरा’ एक सामाजिक फिल्म है। साथ ही ये फिल्म इस साल की अच्छी फिल्मों में से एक है। जहां एक तरफ बड़े निर्देशकों ने इस साल काफी निराश किया है वहीँ इस फिल्म से फिल्म जगत में निर्देशक के तौर पर कदम रखने वाले अविनाश दास ने इस फिल्म के साथ एक प्लेजेंट सरप्राइज दिया है। कैसी है ये फिल्म आइये आपको डीटेल में बताते हैं।

'Anaarkali Of Aarah'
A; Drama
Director: Avinash Das
Cast: Swara Bhaskar, Sanjay Mishra, Pankaj Tripathi

कहानी
आरा जिले में अनारकली के नाच गाने का जलवा है, वो मशहूर है। पर आंचलिक इलाकों में आज भी नाचने गाने वाली औरत को उपभोग की वस्तु समझा जाता है। अनारकली पर भी एक मंत्री प्रतिनिधि की काली छाया पड़ती है। ऐसे में क्या अनारकली अपने हुनर, अपनी इज्ज़त और आत्मसम्मान की रक्षा कर पाती है जानने के लिए देखिये ये फिल्म।

कथा पटकथा और निर्देशन

पत्रकारिता की गहरी समझ रखने वाले अविनाश ने जितना हो सका फिल्म को अपने मुद्दे से भटकने नहीं दिया। फिल्म अपनी कहानी को पूरी निष्ठा के साथ सुनाती है। जहां पिछले साल ‘पिंक’ ने औरतों के प्रति सामाजिक रवैये की एक शहरी कहानी आपके सामने प्रस्तुत की थी, ये फिल्म उसी मुद्दे की आंचलिक जड़ों को खोदती है। जहां पिंक शहरी कामकाजी महिलाओं की कहानी थी, वहीँ ये फिल्म आंचलिक कामकाजी महिलाओं का दर्द बयान करती है। पुलिस , सरकार, और लोगों की औरतों को लेकर धारणा बदलनी चाहिए, ये फिल्म उसी के लिए बनाई गई है। पहले ही बता दिया जाए की ये फिल्म आपको झकझोरने का पूरा प्रयास करती है। फेमिनिस्ट सोच और विचारधारा का पुरजोर समर्थन करने वाली ये फिल्म दर्शकों के लिए एक आसान फिल्म नहीं है। सामाजिक गन्दगी को देख कर दर्शक या तो नज़रें चुरा लेंगे या नज़रें झुका लेंगे। फिल्म का स्क्रीनप्ले कसा हुआ है और फिल्म के संवादों में सच्चाई की आग है। कुल मिलाकर ये फिल्म अपनी बात कहने में सफल होती है और आपको सोचने पे मजबूर भी करती है। फिल्म का सेकंड हाफ थोडा ढीला है पर फिल्म का क्लाइमेक्स बेहद ग्रिपिंग है। फिल्म का आर्ट डायरेक्शन काफी रीयलिस्टिक है।

 


अदाकारी
पिछले साल स्वरा भास्कर ने ‘निल बटे सन्नाटा’ के ज़रिये लोगों की वाह वाही बटोरी थी। इस फिल्म में भी उन्होंने उससे भी एक लेवल ऊपर की परफॉरमेंस दी है। उनकी मेहनत इस फिल्म में साफ़ झलकती है। उनको इस फिल्म के लिए स्टैंडिंग ओवेशन। संजय मिश्र एक ज़बदस्त परफॉर्मर हैं, फिल्म चाहे कैसी भी हो वो अपने रोल के साथ पूरा न्याय करते हैं। आँखों देखी के बाद संजय जी का ये सबसे शानदार परफॉरमेंस हैं। वैसे तो संजय जी खल किरदारों के लिए जाने नहीं जाते, पर इस फिल्म के बाद वो नेगेटिव रोल के लिए भी जाने जाएंगे। पंकज का काम भी शानदार और नेचुरल है। कास्टिंग पिच परफेक्ट है। इसके लिए फुल मार्क्स।

संगीत
फिल्म का संगीत एक दम फिल्म की फील के हिसाब से है। फिल्म के गाने चार्टबस्टर नहीं हैं, पर रीयलिस्टिक ज़रूर हैं।

कुल मिलाकर ये फिल्म एक अच्छी फिल्म है, सेंसर ने इस ‘वयस्क’ रेटिंग वाली फिल्म में भी काफी कट लगाए हैं। इससे फिल्म को नुक्सान साफ़ दिखता है। पर आप इस फिल्म को ज़रूर देखिये, सेंसर भले ही सच्चाई से घबराता हो और सच से कन्नी काटता हो आप इस फिल्म को इस हफ्ते ज़रूर देखिये। छोटे बजट में बनी ये फिल्म एक अच्छी फिल्म है

फिल्म का बॉक्स ऑफिस प्रेडिक्शन : फिल्म अपनी लिमिटेड रिलीज़ और लोकल फील के कारण बाकी बॉलीवुड फिल्मों जैसा बिजनेस भले ही न कर पाए पर अपनी लागत तो निकाल ही लेगी। ये फिल्म अपने पूरे रन में 5 से 10 करोड़ तक कमा सकती है।

Review by : Yohaann Bhaargava
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