'K'for Camera

By: Inextlive | Publish Date: Sat 29-Dec-2012 03:03:04   |  Modified Date: Sat 29-Dec-2012 04:55:26
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'K'for Camera
Patna : घर की देहरी लांघ कर चार विलेज गल्र्स ने उठाया कैमरा और निकल पड़ी गांव की गलियों में, खेत-खलिहानों में न्यूज इक_ा करने. ना मेकअप मैन, न लाइट का पता, ना मूड का. लड़खड़ाती आवाज और रॉन्ग प्रननसिएशन के साथ एंकरिंग. बाग-बगीचे बन गए स्टूडियो और साइकिल बन गई ओवी वैन. एक खपड़ैल घर से शुरू हुई ट्रेनिंग और उसके बाद बना 45 मिनट का पहला न्यूज बुलेटिन. यह सफर पांच साल से बदस्तूर जारी है, रिपोर्टिंग अब भी गांव और देहात की ही, पर सम्मान दिल्ली की सीएम शीला दीक्षित से लेकर अलजजीरा चैनल तक.

 

'K'for Camera

Patna : घर की देहरी लांघ कर चार विलेज गल्र्स ने उठाया कैमरा और निकल पड़ी गांव की गलियों में, खेत-खलिहानों में न्यूज इक_ा करने. ना मेकअप मैन, न लाइट का पता, ना मूड का. लड़खड़ाती आवाज और रॉन्ग प्रननसिएशन के साथ एंकरिंग. बाग-बगीचे बन गए स्टूडियो और साइकिल बन गई ओवी वैन. एक खपड़ैल घर से शुरू हुई ट्रेनिंग और उसके बाद बना 45 मिनट का पहला न्यूज बुलेटिन. यह सफर पांच साल से बदस्तूर जारी है, रिपोर्टिंग अब भी गांव और देहात की ही, पर सम्मान दिल्ली की सीएम शीला दीक्षित से लेकर अलजजीरा चैनल तक. 


कई गांवों में अब तक इलेक्ट्रिसिटी भी नहीं 
मुजफ्फरपुर डिस्ट्रिक्ट टाउन से 55 किलोमीटर दूर रामलीला गाछी, चांदकेवारी एरिया. स्टेट गवर्नमेंट के डॉक्यूमेंट्स में नक्सली एरिया. जहां ऑफिशियल्स भी जाने से डरते हैं. कई गांवों में अब तक इलेक्ट्रिसिटी भी नहीं पहुंची है. कॉलेज 15 किमी दूर. गांव के एक-दो घरों में ही टीवी सेट. आज से पांच साल पहले तक अशिक्षा, चाइल्ड मैरिज, डाउरी, डायन प्रथा सहित कई बुराइयां इस इलाके में आम थीं. ऐसे ही निराशाजनक माहौल में मु_ी भर संसाधन और चार ठेठ देहाती लड़कियोंं की हिम्मत और कुछ उत्साही यूथ के हौसले ने लिख दी नई इबारत. 
जिद और जुनून ने ही किया सबकुछ संभव
पहली बुलेटिन की प्लानिंग व ट्रेनिंग एक लड़की के घर से ही शुरू हुई. जब गल्र्स दियारा इलाका की खाक छानने निकली तो लोग कहने लगे, यह क्या तमाशा शुरू किया छोरियों ने. सभी आलोचनाओं को नजरअंदाज कर पांच-सात स्टोरी शूट की गयी और एडिटिंग के बाद अप्पन समाचार का पहला बुलेटिन बना. रामलीलागाछी के साप्ताहिक बाजार में प्रोजेक्टर के बड़े परदे पर पहली स्क्रीनिंग हुई तो विलेजर्स अपनी बात देख सुन कर बड़े खुश हुए. परदे पर गांव की बेटियां बोल रही थीं- अप्प्पन समाचार में आप सबका स्वागत है. आप देख रहे हैं गांव की लड़कियों का अपना चैनल अप्पन समाचार. इस तरह शुरू हुआ खुशबू, अनीता, रूबी और रूमा का अपना कम्यूनिटी चैनल. पूरी सोच के पीछे मास्टर माइंड संतोष सारंग का था और साथ दिया अमृताज इंदीवर, राजेश कुमार और पंकज ने. आज यह चांदकेवारी एरिया में आंदोलन का रूप ले चुका है. 
चैलेंज था पेरेंट्स को कंवींस करना
गांव की लड़कियों को घर से रिपोर्टिंग के लिए निकालना आसान नहीं था. न्यूज पर काम करने का जोखिम अलग था. गल्र्स की सिक्योरिटी का भरोसा दिलाना भी मुश्किल था. जिद और जुनून ने ही सबकुछ संभव कर दिया. पारू और साहेबगंज प्रखंडों के चार लोग आखिरकार अपनी बेटी को इस काम में लगाने को राजी हुए. लड़कियों के लिए गांव की पगडंडियों पर साइकिल से शूट पर निकलना, इन फायरब्रांड रिपोर्टर के पेरेंट्स को हमेशा डर बना रहता. कई बार ये गल्र्स ईवटिजिंग की शिकार भी हुईं. मगर मनचलों की फब्तियां उनके हौसले डिगा नहीं सकी. इनके काम के अंदाज, ऑनेस्ट एफर्ट और जज्बे को सलाम करनेवालों की कमी भी नहीं थी. हो भी क्यों न आखिरकार इन बेटियों के कारण उनका गांव भी वीआईपी हो चुका था. सड़कों की हालत भी सुधरी और उन्हें कवर करने के लिए कई फिल्मकार और रिसर्चर भी यहां पहुंचने लगे थे.
इनोवेशन को खूब मिली सराहना 
अप्पन समाचार कम्यूनिटी मीडिया का एक शानदार एग्जांपल बना. ग्रामीण पत्रकारिता का अद्भुत प्रयोग. अवेयरनेस के इस डिजीटल माध्यम ने इस नक्सली एरिया की दशा-दिशा बदलने में इंपॉर्टेंट रोल अदा की. बुलेटिन की संस्थापक संतोष सारंग की मानें तो पांच साल में अप्पन समाचार ने मेन स्ट्रीम से कटे एक हजार से अधिक गल्र्स को जर्नलिज्म के बेसिक्स सिखा चुका है. आज यह ऑल वुमेन चैनल के रूप में फेमस है. करीब दो दर्जन गल्र्स टीम स्प्रीट में प्रोड्यूसर, रिपोर्टर, कैमरापर्सन, एंकर, एडिटर और स्क्रिप्ट राइटर की भूमिका बखूबी निभा रही है.
क्या है बुलेटिन में
यह एक पाक्षिक बुलेटिन है. 45 मिनट की बुलेटिन में मोनटाज, 8 से 10 खबरें, कुछ गीत और 5 से 10 मिनट की एक डॉक्यूमेंट्री समाहित होती है. अमूमन एक हाट में तीन से चार पंचायतों के एक से दो हजार लोग आते हैं, जो खरीद-बिक्री के साथ अपने एरिया के न्यूज से लैस होकर घर जाते हैं. फिर माउथ पब्लिशिंग खबरों के असर को कई गुणा बढ़ा देती है. इस तरह चैनल की टीआरपी बढ़ती है. जहां जेनरेटर की सुविधा नहीं है, वहां न्यूज बुलेटिन की सीडी खरीदकर बैटरी पर चलनेवाले टीवी सेट से अप्पन समाचार की ब्रेकिंग न्यूज देखते हैं. चैनल समाचार की टीम अब ब्लैक एंड व्हाइट पेपर में एक माह की बुलेटिन के आधार पर अप्पन समाचार नामक एक मासिक चि_ा भी निकाली है, जिसे गांव में फ्री बंटवाया जाता है. जिसका थीम लाइन है- गांव का अखबार, आम आदमी ही पत्रकार.
क्रिटिक बन गए प्रशंसक
जो लोग वर्षों तक गल्र्स की इस टीम और उनके काम का मजाक उड़ाते थे, वही अपनी बेटी को टीम से जोड़ रहे हैं. पिंकी के किसान पिता पहले अप्पन समाचार की खिल्ली उड़ाते थे. पर, आज वो बेटी का हौसला बढ़ाते हैं. अनीता के पिता वेस्ट बंगाल में लेदर फैक्टरी में नौकरी करते थे. नौकरी छूट गयी, तो गांव में ही किसानी करते हैं और बेटी की तारीफ करते नहीं थकते. वहीं झोपड़ी में रहने वाले सविता के पेरेंट्स बेटी के काम से इसलिए खुश हैं कि समाज में उनकी इज्जत बढ़ गई. गल्र्स के इस इनिशिएटिव ने गांव की सोच को भी बदला है.

Achievements  
* For the innovative effort, in
October 2008 Appan Samachar received the Citizen Journalist Award - a national award from CNN-IBN (Network-18 group). This award was presented by the Chief Minister of Delhi Smt. Sheila Dixit.

* Britain based international organisation ‘One World Media' has selected Appan Samachar as a shortlist winner for Special Award category in 2010.

* Al Jazeera has selected a film 'K for Camera' on APPAN SAMACHAR in it's first ever filmmaker's workshop in Busan, South Korea. They selected 10 filmmakers from South Asia to develop the subject with the Al Jazeera team and Asian Network of Documentary.

* Appan Samachar was introduced in syllabus of Social Science, class VII by S.C.E.R.T.  

* A television documentary programme was made by ARD FIRST GERMAN TV on Appan Samachar.

* German International broadcaster Deutsche Welle came up with the story of Appan Samachar on International Women's Day 8th March 2012  

* A documentary film on Appan Samachar is under production by Rare Frames directed by documentary film maker Dipesh Chandra. 


Team members
रिंकू 
बुलेटिन की प्रोड्यूसर और अप्पन समाचार चि_ा की संपादक के रूप में काम कर रही है. पांच साल पहले टीम से जुड़ी थी. पिता सरपंच रह चुके हैं और मां हाउसवाइफ. वीडियो एडिटिंग भी अब खुद कर लेती है. पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के कार्यक्रम की रिपोर्टिंग कर चुकी है. सीएम का प्रोग्राम भी कवर कर चुकी है.

खुशबू
जब नाइंथ क्लास में थी, तब जुड़ी थी. अप्पन समाचार की मुख्य एंकर के रूप में फेमस है. कैमरा हैंडलिंग भी शानदार तरीके से करती है. अब बीए पार्ट-टू में है. पिता किसान हैं और मां आंगनबाड़ी सेविका. कोसी के बाढ़ को कवर किया था. दूसरे न्यूजपेपर में लिखती है.

अनीता
साहसी रिपोर्टर है. पिता लिटरेट है और मां इलिटरेट है. कैमरे के सामने पीटूसी करती है तो नहीं लगता है कि गांव की लड़की रिपोर्टिंग कर रही है. घर का पूरा सपोर्ट है, सबको अपनी बेटी पर गर्व है. कहानी लिखने का शौक है, कई जगह पब्लिश हो चुकी है.

पिंकी
अप्पन समाचार की स्टार रिपोर्टर है. माइक लेकर जब बाइट लेती है तो ऑफिशियल्स के पसीने छूट जाते हैं. किसान की बेटी है मां हाउसवाइफ है. 17 साल की पिंकी में जबरदस्त उत्साह है.

सविता
रिपोर्टिंग के साथ कैमरा हैंडलिंग भी करती है. पिता मजदूर किसान और मां हाउसवाइफ है. स्टडी के साथ-साथ पापा को खेतों में और मां को किचन में भी हेल्प करती है. उसके बाद का समय अप्पन समाचार के लिए होता है.

कई गांवों में अब तक इलेक्ट्रिसिटी भी नहीं 
मुजफ्फरपुर डिस्ट्रिक्ट टाउन से 55 किलोमीटर दूर रामलीला गाछी, चांदकेवारी एरिया. स्टेट गवर्नमेंट के डॉक्यूमेंट्स में नक्सली एरिया. जहां ऑफिशियल्स भी जाने से डरते हैं. कई गांवों में अब तक इलेक्ट्रिसिटी भी नहीं पहुंची है. कॉलेज 15 किमी दूर. गांव के एक-दो घरों में ही टीवी सेट. आज से पांच साल पहले तक अशिक्षा, चाइल्ड मैरिज, डाउरी, डायन प्रथा सहित कई बुराइयां इस इलाके में आम थीं. ऐसे ही निराशाजनक माहौल में मु_ी भर संसाधन और चार ठेठ देहाती लड़कियोंं की हिम्मत और कुछ उत्साही यूथ के हौसले ने लिख दी नई इबारत. 

जिद और जुनून ने ही किया सबकुछ संभव
पहली बुलेटिन की प्लानिंग व ट्रेनिंग एक लड़की के घर से ही शुरू हुई. जब गल्र्स दियारा इलाका की खाक छानने निकली तो लोग कहने लगे, यह क्या तमाशा शुरू किया छोरियों ने. सभी आलोचनाओं को नजरअंदाज कर पांच-सात स्टोरी शूट की गयी और एडिटिंग के बाद अप्पन समाचार का पहला बुलेटिन बना. रामलीलागाछी के साप्ताहिक बाजार में प्रोजेक्टर के बड़े परदे पर पहली स्क्रीनिंग हुई तो विलेजर्स अपनी बात देख सुन कर बड़े खुश हुए. परदे पर गांव की बेटियां बोल रही थीं- अप्प्पन समाचार में आप सबका स्वागत है. आप देख रहे हैं गांव की लड़कियों का अपना चैनल अप्पन समाचार. इस तरह शुरू हुआ खुशबू, अनीता, रूबी और रूमा का अपना कम्यूनिटी चैनल. पूरी सोच के पीछे मास्टर माइंड संतोष सारंग का था और साथ दिया अमृताज इंदीवर, राजेश कुमार और पंकज ने. आज यह चांदकेवारी एरिया में आंदोलन का रूप ले चुका है. 

चैलेंज था पेरेंट्स को कंवींस करना
गांव की लड़कियों को घर से रिपोर्टिंग के लिए निकालना आसान नहीं था. न्यूज पर काम करने का जोखिम अलग था. गल्र्स की सिक्योरिटी का भरोसा दिलाना भी मुश्किल था. जिद और जुनून ने ही सबकुछ संभव कर दिया. पारू और साहेबगंज प्रखंडों के चार लोग आखिरकार अपनी बेटी को इस काम में लगाने को राजी हुए. लड़कियों के लिए गांव की पगडंडियों पर साइकिल से शूट पर निकलना, इन फायरब्रांड रिपोर्टर के पेरेंट्स को हमेशा डर बना रहता. कई बार ये गल्र्स ईवटिजिंग की शिकार भी हुईं. मगर मनचलों की फब्तियां उनके हौसले डिगा नहीं सकी. इनके काम के अंदाज, ऑनेस्ट एफर्ट और जज्बे को सलाम करनेवालों की कमी भी नहीं थी. हो भी क्यों न आखिरकार इन बेटियों के कारण उनका गांव भी वीआईपी हो चुका था. सड़कों की हालत भी सुधरी और उन्हें कवर करने के लिए कई फिल्मकार और रिसर्चर भी यहां पहुंचने लगे थे.

इनोवेशन को खूब मिली सराहना 
अप्पन समाचार कम्यूनिटी मीडिया का एक शानदार एग्जांपल बना. ग्रामीण पत्रकारिता का अद्भुत प्रयोग. अवेयरनेस के इस डिजीटल माध्यम ने इस नक्सली एरिया की दशा-दिशा बदलने में इंपॉर्टेंट रोल अदा की. बुलेटिन की संस्थापक संतोष सारंग की मानें तो पांच साल में अप्पन समाचार ने मेन स्ट्रीम से कटे एक हजार से अधिक गल्र्स को जर्नलिज्म के बेसिक्स सिखा चुका है. आज यह ऑल वुमेन चैनल के रूप में फेमस है. करीब दो दर्जन गल्र्स टीम स्प्रीट में प्रोड्यूसर, रिपोर्टर, कैमरापर्सन, एंकर, एडिटर और स्क्रिप्ट राइटर की भूमिका बखूबी निभा रही है.

क्या है बुलेटिन में
यह एक पाक्षिक बुलेटिन है. 45 मिनट की बुलेटिन में मोनटाज, 8 से 10 खबरें, कुछ गीत और 5 से 10 मिनट की एक डॉक्यूमेंट्री समाहित होती है. अमूमन एक हाट में तीन से चार पंचायतों के एक से दो हजार लोग आते हैं, जो खरीद-बिक्री के साथ अपने एरिया के न्यूज से लैस होकर घर जाते हैं. फिर माउथ पब्लिशिंग खबरों के असर को कई गुणा बढ़ा देती है. इस तरह चैनल की टीआरपी बढ़ती है. जहां जेनरेटर की सुविधा नहीं है, वहां न्यूज बुलेटिन की सीडी खरीदकर बैटरी पर चलनेवाले टीवी सेट से अप्पन समाचार की ब्रेकिंग न्यूज देखते हैं. चैनल समाचार की टीम अब ब्लैक एंड व्हाइट पेपर में एक माह की बुलेटिन के आधार पर अप्पन समाचार नामक एक मासिक चि_ा भी निकाली है, जिसे गांव में फ्री बंटवाया जाता है. जिसका थीम लाइन है- गांव का अखबार, आम आदमी ही पत्रकार.

क्रिटिक बन गए प्रशंसक
जो लोग वर्षों तक गल्र्स की इस टीम और उनके काम का मजाक उड़ाते थे, वही अपनी बेटी को टीम से जोड़ रहे हैं. पिंकी के किसान पिता पहले अप्पन समाचार की खिल्ली उड़ाते थे. पर, आज वो बेटी का हौसला बढ़ाते हैं. अनीता के पिता वेस्ट बंगाल में लेदर फैक्टरी में नौकरी करते थे. नौकरी छूट गयी, तो गांव में ही किसानी करते हैं और बेटी की तारीफ करते नहीं थकते. वहीं झोपड़ी में रहने वाले सविता के पेरेंट्स बेटी के काम से इसलिए खुश हैं कि समाज में उनकी इज्जत बढ़ गई. गल्र्स के इस इनिशिएटिव ने गांव की सोच को भी बदला है.

Achievements  
* For the innovative effort, in October 2008 Appan Samachar received the Citizen Journalist Award - a national award from CNN-IBN (Network-18 group). This award was presented by the Chief Minister of Delhi Smt. Sheila Dixit.

* Britain based international organisation ‘One World Media' has selected Appan Samachar as a shortlist winner for Special Award category in 2010.

* Al Jazeera has selected a film 'K for Camera' on APPAN SAMACHAR in it's first ever filmmaker's workshop in Busan, South Korea. They selected 10 filmmakers from South Asia to develop the subject with the Al Jazeera team and Asian Network of Documentary.

* Appan Samachar was introduced in syllabus of Social Science, class VII by S.C.E.R.T.  

* A television documentary programme was made by ARD FIRST GERMAN TV on Appan Samachar.

* German International broadcaster Deutsche Welle came up with the story of Appan Samachar on International Women's Day 8th March 2012  

* A documentary film on Appan Samachar is under production by Rare Frames directed by documentary film maker Dipesh Chandra. 

Team members
रिंकू : 
बुलेटिन की प्रोड्यूसर और अप्पन समाचार चि_ा की संपादक के रूप में काम कर रही है. पांच साल पहले टीम से जुड़ी थी. पिता सरपंच रह चुके हैं और मां हाउसवाइफ. वीडियो एडिटिंग भी अब खुद कर लेती है. पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के कार्यक्रम की रिपोर्टिंग कर चुकी है. सीएम का प्रोग्राम भी कवर कर चुकी है.

खुशबू : जब नाइंथ क्लास में थी, तब जुड़ी थी. अप्पन समाचार की मुख्य एंकर के रूप में फेमस है. कैमरा हैंडलिंग भी शानदार तरीके से करती है. अब बीए पार्ट-टू में है. पिता किसान हैं और मां आंगनबाड़ी सेविका. कोसी के बाढ़ को कवर किया था. दूसरे न्यूजपेपर में लिखती है.

अनीता : साहसी रिपोर्टर है. पिता लिटरेट है और मां इलिटरेट है. कैमरे के सामने पीटूसी करती है तो नहीं लगता है कि गांव की लड़की रिपोर्टिंग कर रही है. घर का पूरा सपोर्ट है, सबको अपनी बेटी पर गर्व है. कहानी लिखने का शौक है, कई जगह पब्लिश हो चुकी है.

पिंकी : अप्पन समाचार की स्टार रिपोर्टर है. माइक लेकर जब बाइट लेती है तो ऑफिशियल्स के पसीने छूट जाते हैं. किसान की बेटी है मां हाउसवाइफ है. 17 साल की पिंकी में जबरदस्त उत्साह है.

सविता : रिपोर्टिंग के साथ कैमरा हैंडलिंग भी करती है. पिता मजदूर किसान और मां हाउसवाइफ है. स्टडी के साथ-साथ पापा को खेतों में और मां को किचन में भी हेल्प करती है. उसके बाद का समय अप्पन समाचार के लिए होता है.

Report by Chandan Sharma
chandan.sharma@inext.co.in