खर्च न बताने के कितने बहाने

By: Inextlive | Publish Date: Thu 07-Dec-2017 04:01:00
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खर्च न बताने के कितने बहाने

- इले1शन कमीशन की तय सीमा से निकाय चुनाव में ढेरों प्रत्याशियों ने किया ज्यादा खर्च

- खर्च का 4योरा तैयार कराने में कर रहे माथा- पच्ची

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भतीजे की शादी है। अभी तो इसमें बहुत व्यस्तता है। शादी के बाद खाली होंगे तो चुनाव खर्च का ब्योरा तैयार करके दे पायेंगे। भाई फुर्सत ही कहां मिली पायी कि खर्च का ब्योरा तैयार किया जाए। चुनाव में इतनी भागदौड़ के बाद अब तो थोड़ा सांस लेने की फुर्सत मिल पायी है। ये तो बस बानगी है उन बहानों की जो निकाय चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी इन दिनों बना रहे हैं। ताकि चुनाव खर्च का ब्योरा तैयार करने का उन्हें वक्त मिल जाए और उसमें ऐसी कोई गड़बडी ना हो कि राजनीतिक भविष्य अधर में लटक जाये। हालांकि अभी इलेक्शन कमीशन को खर्च का ब्योरा मुहैया कराने में वक्त है लेकिन इसे सभी प्रत्याशियों को देना अनिवार्य है। अभी तक किसी प्रत्याशी का चुनाव खर्च का ब्योरा जिला निर्वाचन कार्यालय नहीं पहुंचा है.

बढ़ायी गयी खर्च सीमा

इलेक्शन कमीशन ने इस बार निकाय चुनाव में खर्च की सीमा बढ़ा दी थी। लगभग एक दशक बाद ऐसा किया गया। इस बार मेयर कैंडीडेट को 20 से 25 लाख खर्च करने की छूट मिली जबकि यह धनराशि पहले 12.5 लाख थी। इलेक्शन कमीशन ने उन शहरों जिनमें वार्डो की संख्या 80 से कम है के मेयर की खर्च सीमा 20 लाख तय की। 80 से ऊपर वार्ड वाले मेयर 25 लाख तक खर्च कर सकते थे। वहीं पार्षद की खर्च सीमा दो लाख रही। नगर पालिका परिषद जहां सीट की संख्या 40 के आसपास है वहां 8 लाख और जहां कम हो वहां के पालिका अध्यक्ष प्रत्याशी छह लाख खर्च कर सकते थे। सदस्य डेढ़ लाख। नगर पंचायत अध्यक्ष प्रत्याशियों के लिए खर्च की सीमा डेढ़ लाख और सदस्य की 30 हजार तय थी।

दिल खोलकर किया खर्च

- इलेक्शन कमीशन की ओर से तय खर्च सीमा तो सिर्फ कार्यकर्ताओं के चाय- नाश्ते में निकल गया।

- निकाय चुनाव में वो‌र्ट्स तक खूब गिफ्ट पहुंचे। बैनर- पोस्टर, पम्फलेट और ढेरों खर्च हैं जो प्रत्याशियों को प्रत्यक्ष या अप्रत्क्ष करना पड़ा।

- प्रत्याशियों के प्रचार के लिए दिन- रात एक किये समर्थकों के हर रोज खाने- पीने से लेकर ब्रांडेड कपड़े- जूते तक का इंतजाम हुआ।

- प्रत्याशी ने बैनर- पोस्टर, टोपी, बैच, दुपट्टा, पम्फलेट, स्टीकर, टी- शर्ट आदि प्रचार सामग्री बनवाया।

- प्रचार और वो‌र्ट्स को ढोने के लिए वाहनों का इंतजाम करना पड़ा।

- क्षेत्र के मठाधीशों को मैनेज करने के लिए हर वो जतन करना पड़ा जो वो चाहते थे

लग सकता है प्रतिबंध

- चुनाव खर्च का ब्योरा चुनाव के बाद तीन महीने के अंदर दाखिल करना है

- इसमें नामांकन दाखिल से लेकर निर्वाचन की घोषणा तक हर दिन का खर्च का हिसाब देना होगा

- व्यय लेखा रजिस्टर वाउचर सहित जिला स्तरीय समीति को सौंपना होगा

- तय सीमा में व्यय का ब्योरा नहीं देने वाले प्रत्याशी के खिलाफ इलेक्शन कमीशन कड़ी कार्रवाई कर सकता है

- उसे आगे कभी चुनाव न लड़ने का प्रतिबंध लग सकता है

- प्रत्याशियों की ओर से दिये गये खर्च के ब्योरा की जांच जिला निर्वाचन कार्यालय की ओर से किया जाएगा

- चुनाव की गतिविधियों की वीडियो और फोटोग्राफी का इस्तेमाल इसके लिए किया जाएगा.

पहुंच रहे शरण में

चुनाव में जीत हासिल करने के लिए लगभग सभी प्रत्याशियों ने जमकर खर्च किया। अब इसका ब्योरा देना बड़ा सिरदर्द बन गया है। परेशानी यह है कि जहां भी रुपये खर्च हुए उनमें से ढेरों का बिल- बाउचर नहीं है। जबकि इलेक्शन कमीशन को खर्च सबूत के साथ देना है। चुनाव का खर्च बिल्कुल इलेक्शन कमीशन के मुताबिक तैयार कराने के लिए प्रत्याशी अब सीए की शरण में हैं। सिर्फ उन्हीं खर्चो का ब्योरा शामिल कर रहे हैं जो सामने नजर आ रहा है वो भी बेहद सटीकता के साथ। इसमें वक्त तो लगेगा ही। प्रत्याशी जल्दबाजी में कोई गड़बड़ी नहीं करना चाहता है.

हर प्रत्याशियों को निकाय चुनाव में खर्च का ब्योरा देना अनिवार्य है। ब्योरा नहीं देने वाले के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान है।

आरआर वर्मा

सहायक जिला निर्वाचन अधिकारी

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