-एटीएम कैशवैन से लूट की हुई दो घटनाओं के खुलासे में पुलिस के छूट रहे पसीने

-पुलिस के रडार पर आये गिरोह के सदस्य वारदात के बाद हो जाते हैं ओझल, पकड़ पाना हो रहा मुश्किल

VARANASI

शहर के इनामी बदमाशों की तलाश में हलकान पुलिस के सामने बाहर से आने वाले आपराधिक गिरोह बड़ी चुनौती बन रहे हैं. कटिहार और उडि़या गैंग के बाद एटीएम कैशवैन से 38 और 26.5 लाख रुपये की हुई लूट के मामले में तमिलनाडु गैंग पुलिस की सांस अटकाए हुए है. एक से डेढ़ दर्जन की संख्या में निकलने वाले गिरोह के सदस्य वारदात के बाद तितर-बितर हो जाते हैं, ऐसे में उन्हें पकड़ पाना नामुमकिन हो जाता है.

साल में दो-तीन वारदात, बाकी िदन नौकरी

10 अप्रैल को लंका में एटीएम कैशवैन से रुपये लेकर भाग रहे बदमाशों को मुगलसराय में पुलिस ने दबोच लिया. तिरुचिरापल्ली निवासी तीन युवकों से पूछताछ में जो खुलासे हुए उसके जानने के बाद पुलिस ने भी दांतों तले उंगली दबा ली. युवकों ने बताया कि सभी पढ़े-लिखे हैं और अपने शहर और आसपास में प्राइवेट फर्मो में नौकरी करते हैं. साल में दो तीन वारदातों में लंबा हाथ मार लेते हैं. इसके बाद पूरे साल चुपचाप रहते हैं.

सीखते हैं लोकल लैंग्वेज

पुलिस के मुताबिक, अपराध करने से पहले गिरोह के कुछ लोग लोकल लैंग्वेज सीख लेते हैं ताकि उन पर बाहरी होने का शक न हो. रुकने के लिए यह रेलवे-रोडवेज स्टेशन नहीं बल्कि मंदिर, श्मशान घाट, मॉल या सस्ते गेस्ट हाउस चुनते हैं ताकि इन पर कोई शक न करे. इसके अलावा यह पब्लिक ट्रांसपोर्ट के जरिए सफर करते हैं और थोड़ी-थोड़ी दूरी पर टेंपो, बस और ट्रेन भी बदलते रहते हैं.

पुलिस को भी 'लक' का आसरा

दूसरे प्रदेश से आने वाले इन गिरोहों के साथ सबसे बड़ी परेशानी यह है कि पुलिस के पास इनकी पहचान या पते के बारे में कोई जानकारी नहीं होती. ऐसे में यह मामले किस्मत के भरोसे होते हैं. अगर बदमाश पकड़े गए तो ठीक वरना मामले कभी खुल ही नहीं पाते. खास बात यह है कि इन गिरोहों के तमाम लोकल हैंडलर्स भी हैं मगर सबूतों के बिना इन पर हाथ डालना मुश्किल होता है.

ऐसे करते हैं काम

- 12 से 18 की संख्या में निकलते हैं गिरोह के सदस्य

- रेकी, लूट और कवर का काम अलग-अलग लोगों के जिम्मे

- वारदात के बाद किसी सेफ जगह पर रुककर होता है रुपयों का बंटवारा

- अपने हिस्से के रुपये लेकर सभी अलग-अलग दिशा में निकलते हैं

- दो-तीन बड़ी वारदातों के बाद गिरोह सालभर तक कुछ नहीं करता

वर्जन

बाहर का होने के कारण गिरोह की पहचान और मॉडस ऑपरेंडी जानना मुश्किल होता है. मगर अपराध करने वाले कानून के शिकंजे में जरूर आते हैं. इनकी धरपकड़ के लिए पुलिस हरसंभव प्रयास कर रही है.

दिनेश कुमार सिंह, एसपी सिटी वाराणसी