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गिरीश कर्नाड: एक कलाकार जो इतिहास और पुराणों से जोड़कर करते हैं आज की बात

By: Inextlive | Publish Date: Fri 19-May-2017 12:00:00
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गिरीश कर्नाड: एक कलाकार जो इतिहास और पुराणों से जोड़कर करते हैं आज की बात
जब हम गिरीश कर्नाड की बात करते हैं तो बहुत से लोगों के जहन में बॉलीवुड के एक करेक्‍टर एक्‍टर तस्‍वीर आती है, लेकिन उनका व्‍यक्‍तित्‍व इससे बहुत बड़ा और अलग था। आज हम उनके जन्‍मदिन पर उनके व्‍यक्‍तिव के विभिन्‍न पहलुओं से जुड़ी कुछ बातें आपको बतायेंगे।

बचपन से ही कलाकार थे गिरीश
गिरीश कर्नाड का जन्म 19 मई, 1938 को महाराष्ट्र के माथेरान में हुआ था। उनको बचपन से ही नाटकों में रुचि थी। उन्‍होंने स्कूल के समय से ही थियेटर में काम करना शुरू कर दिया था।

विदेश से पढ़ कर लौटे
कर्नाटक आर्ट कॉलेज से ग्रेजुएशन करने के बाद गिरीश इंग्लैण्ड चले गए। वहां उन्होंने आगे की पढ़ाई पूरी की और फिर भारत लौट आए। इसके बाद चेन्नई में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में सात साल तक काम किया। इस दौरान वह चेन्नई के कई आर्ट और थियेटर क्लबों से जुड़े रहे। थियेटर की खातिर ही उन्‍होंने नौकरी से भी इस्‍तीफा दे दिया।

फिर सात समंदर पार
कुछ समय बाद वह शिकागो चले गए और यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो में बतौर प्रोफ़ेसर काम करने लगे। गिरीश का मन वहां रमा नहीं और वे दोबारा भारत लौट आए। लौटने के बाद वो पूरी तरह साहित्य और फिल्‍मों से जुड़ गए। उन्‍होंने क्षेत्रीय भाषाओं में कई फ़िल्में बनाईं भी और कई फ़िल्मों की पटकथा भी लिखी।
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गिरीश के नाटक
गिरीश कर्नाड ने पहला नाटक कन्नड़ में लिखा और उसके बाद उसका अंग्रेज़ी अनुवाद भी किया। उनके नाटकों में 'ययाति', 'तुग़लक', 'हयवदन', 'अंजु मल्लिगे', 'अग्निमतु माले', 'नागमंडल' और 'अग्नि और बरखा' काफी प्रसिद्ध हुए हैं। उन्‍होंने अपनी ज्‍यादातर रचनायें कन्नड़ भाषा में लिखीं।
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इतिहास और पुराण की आधुनिक संदर्भों में प्रस्‍तुति
कर्नाड ने ऐतिहासिक और पौराणिक पात्रों की तत्कालीन व्यवस्था को आधुनिक संदर्भों में इस्‍तेमाल करने का तरीका अपनाया जो काफ़ी लोकप्रिय हुआ। उनके नाटक ययाति और तुग़लक़ जैसे नाटक इसी का उदाहरण हैं। तुगलक का कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद भी हुआ। गिरीश की रचनाओं में जहां पुरातन भारत की झलक दिखती है वहीं आधुनिकता का प्रभाव भी नजर आता है।
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लेखन और निर्देश दोनों में सफल
गिरीश कर्नाड एक सफल पटकथा लेखक होने के साथ एक बेहतरीन फ़िल्म निर्देशक भी हैं। उन्‍होंने 1970 में कन्नड़ फ़िल्म 'संस्कार' से अपने स्‍क्रिप्‍ट राइटर करियर का डेब्‍यु किया। उन्होंने कई हिन्दी फ़िल्मों में अभिनय भी किया, जिसमें निशांत, मंथन, पुकार आदि प्रमुख हैं। साथ ही गिरीश कर्नाड ने छोटे परदे पर भी कई कार्यक्रम और 'सुराजनामा' जैसे सीरियल्‍स में काम किया है। कर्नाड संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।

पुरस्‍कार ही पुरस्‍कार
गिरीश कर्नाड को कई पुरस्‍कारों से सम्‍मानित किया जा चुका है। उनके पुरस्‍कारों की लिस्‍ट में 1994 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1998 में ज्ञानपीठ पुरस्कार, 1974 में पद्म श्री, 1992 में पद्म भूषण, 1972 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1992 में कन्नड़ साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1998 में ज्ञानपीठ पुरस्कार और 1998 में कालिदास सम्मान शामिल हैं। इसके अलावा कर्नाड को कन्नड़ फ़िल्म ‘संस्कार’ के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका है।

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