जब 16 साल की लड़की को दिल दे बैठे थे जिन्ना

By: Inextlive | Publish Date: Mon 11-Sep-2017 04:55:49
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जब 16 साल की लड़की को दिल दे बैठे थे जिन्ना
जब नाश्ते की मेज़ पर मुंबई के बड़े रइसों में से एक सर दिनशॉ पेटिट ने अपने प्रिय अख़बार बॉम्बे क्रॉनिकल का आठवाँ पन्ना खोला तो एक ख़बर पर नज़र पड़ते ही अख़बार उनके हाथों से नीचे गिर गया। तारीख़ थी 20 अप्रैल, 1918 और ख़बर थी कि पिछली शाम मोहम्मद अली जिन्ना ने सर दिनशॉ की बेटी लेडी रति से शादी कर ली। कहानी शुरू हुई थी दो साल पहले जब सर दिनशॉ ने अपने दोस्त और वकील मोहम्मद अली जिन्ना को दार्जिलिंग आने की दावत दी थी।

वहाँ पर दिनशॉ की 16 साल की बेटी रति भी मौजूद थीं, जिनका शुमार उस ज़माने में मुंबई की सबसे हसीन लड़कियों में हुआ करता था। जिन्ना उन दिनों भारतीय राजनीति के शिखर को छूने के बिल्कुल करीब थे।

हालाँकि उस समय उनकी उम्र 40 साल की थी, लेकिन दार्जिलिंग की बर्फ़ से ढकी ख़ामोश चोटियों और रति के बला के हुस्न ने ऐसा समा बाँधा कि रति और जिन्ना एक दूसरे के प्रेम पाश में गिरफ़्तार हो गए।

उन्होंने उसी यात्रा के दौरान सर दिनशॉ पेटिट से उनकी बेटी का हाथ माँग लिया। 'मिस्टर एंड मिसेज़ जिन्ना- द मैरेज दैट शुक इंडिया' की लेखिका शीला रेड्डी बताती हैं, "दार्जिलिंग मे ही एक बार रात के खाने के बाद जिन्ना ने सर दिनशॉ से सवाल किया कि दो धर्मों के बीच शादी के बारे में वो क्या सोचते हैं?"

 

जिन्ना की पेशकश

रति के पिता ने छूटते ही जवाब दिया कि इससे राष्ट्रीय एकता कायम करने में मदद मिलेगी। अपने सवाल का इससे अच्छा जवाब तो ख़ुद जिन्ना भी नहीं दे सकते थे। उन्होंने एक लफ़्ज़ भी ज़ाया न करते हुए दिनशॉ से कहा कि वो उनकी बेटी से शादी करना चाहते हैं।

जिन्ना की इस पेशकश से दिनशॉ गुस्से से पागल हो गए। उन्होंने उनसे उसी वक्त अपना घर छोड़ देने के लिए कहा। जिन्ना ने इस मुद्दे पर पूरी शिद्दत से पैरवी की, लेकिन वो दिनशॉ को मना नहीं सके।'

दो धर्मों के बीच दोस्ती का उनका फ़ॉर्मूला पहले ही परीक्षण में नाकामयाब हो गया। इसके बाद दिनशॉ ने उनसे कभी बात नहीं की और रति पर भी पाबंदी लगा दी कि जब तक वो उनके घर में रह रही हैं, वो जिन्ना से कभी नहीं मिलेंगी।

और तो और उन्होंने अदालत से भी आदेश ले लिया कि जब तक रति वयस्क नहीं हो जातीं, जिन्ना उनसे नहीं मिल सकेंगे। लेकिन इसके बावजूद जिन्ना और रति न सिर्फ़ एक दूसरे से चोरी छिपे मिलते रहे बल्कि एक दूसरे को ख़त भी लिखते रहे।

 

18 साल की रति

शीला रेड्डी बताती हैं, 'एक बार दिनशॉ ने रति को एक ख़त पढ़ते हुए देखा। वो ज़ोर से चिल्लाए कि इसे ज़रूर जिन्ना ने लिखा है। वो रति को पकड़ने के लिए एक डायनिंग टेबिल के चारों और भागने लगे ताकि वो उसके हाथों से जिना का लिखा ख़त छीन लें लेकिन वो रति को नहीं पकड़ पाए।'

सर दिनशॉ का वास्ता एक ऐसे बैरिस्टर से था जो शायद ही कोई मुक़दमा हारता था। दिनशॉ जितने ज़िद्दी थे, लंबे अर्से से इश्क की जुदाई झेल रहा ये जोड़ा उनसे ज़्यादा ज़िद्दी साबित हुआ। दोनों ने धीरज, ख़ामोशी और शिद्दत से रती के 18 साल के होने का इंतज़ार किया।

जिन्ना के एक और जीवनीकार प्रोफ़ेसर शरीफ़ अल मुजाहिद कहते हैं कि 20 फ़रवरी, 1918 तो जब रति 18 साल की हुईं तो उन्होंने एक छाते और एक जोड़ी कपड़े के साथ अपने पिता का घर छोड़ दिया।

जिन्ना रति को जामिया मस्जिद ले गए जहाँ उन्होंने इस्लाम कबूल किया और 19 अप्रैल, 1918 को जिन्ना और रति का निकाह हो गया।

 

भारतीय समाज

रति जिन्ना पर किताब लिखने वाले ख़्वाजा रज़ी हैदर कहते हैं कि जिन्ना इंपीरियल लेजेस्लेटिव काउंसिल में मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। अगर वो सिविल मैरेज एक्ट के तहत शादी करते तो उन्हें संभवत: अपनी सीट से इस्तीफ़ा देना पड़ता।

इसलिए उन्होंने इस्लामी तरीके से शादी करने का फ़ैसला किया और रति इसके लिए तैयार भी हो गईं। निकाहनामे में 1001 रुपये का मेहर तय हुआ, लेकिन जिन्ना ने उपहार के तौर पर रति को एक लाख पच्चीस हज़ार रुपये दिए जो 1918 में बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी।

जिन्ना की अपने से 24 साल छोटी लड़की से शादी उस ज़माने के दकियानूसी भारतीय समाज के लिए बहुत बड़ा झटका था।

 जवाहरलाल नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित ने अपनी आत्मकथा द स्कोप ऑफ़ हैपीनेस में लिखा है, "श्री जिन्ना की अमीर पारसी सर दिनशॉ की बेटी से शादी से पूरे भारत में एक तरह का आंदोलन खड़ा हो गया। मैं और रति करीब-करीब एक ही उम्र की थीं, लेकिन हम दोनों की परवरिश अलग-अलग ढ़ंग से हुई थी। जिन्ना उन दिनों भारत के नामी वकील और उभरते हुए नेता थे। ये चीज़ें रति को अच्छी लगती थीं। इसलिए उन्होंने पारसी समुदाय और अपने पिता के विरोध के बावजूद जिन्ना से शादी की।"

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रति का प्यार

भारत कोकिला के नाम से मशहूर सरोजिनी नायडू ने भी डॉक्टर सैयद महमूद को लिखे पत्र में जिन्ना की शादी का ज़िक्र करते हुए लिखा, "आख़िरकार जिन्ना ने अपनी लालसा के नीले गुलाब को तोड़ ही लिया। मैं समझती हूँ कि लड़की ने जितनी बड़ी कुर्बानी दी है उसका उसे अंदाज़ा ही नहीं है, लेकिन जिन्ना इसके हक़दार हैं। वो रति को प्यार करते हैं। उनके आत्मकेंद्रित और अंतर्मुखी व्यक्तित्व का यही एक मानवीय पहलू है।"

ख़्वाजा रज़ी हैदर लिखते हैं कि सरोजिनी नायडू भी जिन्ना के प्रशंसकों में से एक थीं और 1916 के कांग्रेस अधिवेशन के दौरान उन्होंने जिन्ना पर एक कविता भी लिखी थी।

जिन्ना के जीवनीकार हेक्टर बोलिथो ने अपनी किताब में एक बूढ़ी पारसी महिला का ज़िक्र किया है जिसका मानना था कि सरोजिनी को भी जिन्ना से इश्क था, लेकिन जिन्ना ने उनकी भावनाओं का जवाब नहीं दिया। वो ठंडे और अलग-थलग बने रहे।

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जिन्ना से प्यार

हालाँकि सरोजिनी बंबई की नाइटेंगल के रूप में जानी जाती थीं लेकिन जिन्ना पर उनके सुरीले गायन का कोई असर नहीं हुआ। मैंने शीला रेड्डी से पूछा कि क्या सरोजिनी नायडू को भी जिन्ना से प्यार था? उनका जवाब था, नहीं। लेकिन सरोजिनी उनकी इज़्ज़त बहुत करती थीं।

जिन्ना के एक और बॉयोग्राफ़र अज़ीज़ बेग ने रती और सरोजिनी नायडू के जिन्ना के प्रति प्रेम का ज़िक्र अपनी किताब में एक अलग शीर्षक के तहत किया है और उसका नाम उन्होंने दिया है, 'टू विनसम विमेन।'

अज़ीज़ बेग लिखते हैं कि एक फ़्रेंच कहावत है कि मर्दों की वजह से औरतें एक दूसरे को नापसंद करने लगती हैं। लेकिन सरोजिनी में रति के प्रति जलन का भाव कतई नहीं था। वास्तव में उन्होंने जिन्ना को रति से शादी करने में मदद की।

वर्ष 1918 के उस वसंत में जिन्ना और रति के दमकते और ख़ुशी से भरे चेहरों को देख कर लगता था कि वो एक दूसरे के लिए ही बने हैं।

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