Qaidi Band Review : कैदियों का बैंड न जानदार और न ही असरदार

By: Inextlive | Publish Date: Fri 25-Aug-2017 06:01:05
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Qaidi Band Review : कैदियों का बैंड न जानदार और न ही असरदार
ऐसा कहा जा रहा था कि कैदी बैंड सत्य घटनाओं पर आधारित है, और देखा जाए तो अंडरट्रायल्स की व्यथा को दर्शाती हुई एक अच्छी फिल्म भी हो सकती थी, पर ये फिल्म हबीब फैसल की फिल्मों में से अब तक की सबसे औसत फिल्म है।

कहानी :
संजू और बिंदु दो टैलेंटेड पर वर्चस्वविहीन अंडरट्रायल कैदी हैं, जो अपने जेलर देवेन्द्र के कहने पर कुछ और अतरंगी और रंगबिरंगे कैदियों को साथ लेकर, स्वतंत्रता दिवस पर आलाकमान अफसरों के मनोरंजन के लिए एक बैंड बनाते हैं, और कैसे ये बैंड उन्हें जेल की बाहर की दुनिया से जोड़ता है।

समीक्षा
कहानी बुरी नहीं है, पर कहानी का ट्रीटमेंट बेहद घिसा हुआ है, यशराज की ये जेल कैंडीफ्लॉस और बहुत लाइवली है और कहानी के माध्याम से पूरी कोशिश की जाती है, की लोग इस जेल को सिरिअसली लें, पर अफ़सोस ऐसा हो नहीं पाता। यहाँ तक की एक सीन में एक कैदी खुद चीख चीख कर जज को बताने की कोशिश करती है की जेल की ज़िन्दगी कैसी होती है, हद है बहनजी ! आप जज को जेल के बारे में बता रही हैं, कुछ तो जज साहब के तजुर्बे का ख़याल कीजिये। फिल्म के संवाद इस फिल्म की सबसे ज्यादा मट्टी पलीद करते हैं, कहीं कहीं पर ये इतने बचकाने हैं की पूछिए मत, लगता ही नहीं है की ये संवाद उन्ही हबीब साहब ने लिखे हैं जिन्होंने दो दूनी चार,बैंड बाजा बरात और इशकजादे में इतनी रीयलिस्टिक राइटिंग की है। यहाँ एक और बहुत बड़ी समस्या है इस फिल्म के अधपके किरदार जिनसे आप रिलेट ही नहीं कर पाते आपको एक वक़्त तक आके उनसे कोई आत्मीयता या अपनापन, यहाँ तक की सहानुभूति भी नहीं होती।  इससे पहले भी जेल के अन्दर के माहौल पर कितनी ही फिल्में हम देख चुके हैं, बंदिनी हो या एक हसीना थी, ऐसी फिल्मों ने जेल और कैदियों की मनोव्यथा और उनके द्वारा झेले जा रहे दुःख दर्द को बखूबी दिखाया है।याद है 'एक हसीना थी'? सारिका की हर एक तकलीफ पे दर्शक सिहर उठे थे, पर यहाँ संजू और बिंदु के लिए ऐसा कुछ भी फील नहीं होता। कहीं कहीं पे तो जेलर का किरदार भी शोले फिल्म के असरानी साहब द्वारा निभाये गए जेलर की झलक लिए हुए है। फिल्म का कॉस्टयूम डिपार्टमेंट भी इसका ज़िम्मेदार है, फैशनेबल कपड़ों में कैद इन किरदारों को कौन सीरियसली लेगा?

 



अदाकारी
इस फिल्म से दो नए एक्टर्स को लांच किया गया है, आन्या सिंह और आदर जैन। आन्या का काम इस फिल्म का प्लस पॉइंट है, वो एक टैलेंटेड अभिनेत्री हैं और अगर सही रोल मिले तो वो काफी आगे जाएंगी, वही इस फिल्म की सेविंग ग्रेस हैं। आदर जैन 'रणबीर कपूर सिंड्रोम' से ग्रसित हैं, हर सीन में वो रणबीर कपूर की कॉपी करते से नज़र आते हैं, जैसे साबित करने की कोशिश कर रहे हों की वो रणबीर के रिश्तेदार हैं, उनको अपनी डाइलोग डिलीवरी पर काम करने की सख्त ज़रुरत है।

संगीत
जो इस फिल्म का सबसे बड़ा हाईलाइट हो सकता था, वही इस फिल्म का सबसे बड़ा माइनस पॉइंट है, एक बैंड की कहानी में संगीत ही अच्छा न हो तो 'मैजिक' कैसे आएगा। न तो ये सुरीला है न ही एंटरटेनिंग।

वर्डिक्ट
कुलमिलाकर एक अच्छी कहानी पर 'कैदी बैंड' एक बेहद औसत फिल्म है। ये फिल्म कहीं बेहतर और रोचक हो सकती थी, और आन्या और आदर के लिए एक बढ़िया लांचपैड हो सकती थी, पर अपनी अधकचरा राइटिंग के चलते ये बस एक अच्छा कांसेप्ट बन के रह जाती है। ये फिल्म, निर्देशक हबीब फैसल  साहब की विशफुल थिंकिंग मात्र दिखती है। फिल्म में जेल और कैदियों के असल दुःख दर्द से कहीं दूर एक ऐसा भ्रम पैदा करने की कोशिश की गई है जो ना तो रियल है और न ही एंटरटेनिंग।

बॉक्स ऑफिस प्रेडिक्शन : छोटे बजट के कारण कम नुक्सान होना चाहिए, ये फिल्म 10 करोड़ तक कमा लेगी।

Review by : Yohaann Bhaargava