Review: टॉयलेट एक प्रेम कथा देखने के बाद पेट ही नहीं दिल भी रहेगा खुश

By: Inextlive | Publish Date: Fri 11-Aug-2017 06:23:05
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Review: टॉयलेट एक प्रेम कथा देखने के बाद पेट ही नहीं दिल भी रहेगा खुश
आज भी गांव देहातों में ही नहीं बल्कि मुम्बई जैसे शहरों में भी एक बड़ा तबका है जो खुले में शौच करता है। इसमें महिलाओं का भी बड़ा हिस्सा है, लंबे समय से अखबारों से जुड़े होने के कारण में इस बात से इत्तेफाक रखता हूँ कि खुले में शौच करने वाली महिलाओं पर कई हमले होते रहे हैं, कई महिलाओं को जान से तो किसी को पुरुषों की मलिन सोच के कारण अपनी अस्मिता से हाथ धोना पड़ा है। अखबारों में ऐसी खबरें नित पढ़ने को मिल जाएंगी। ये फ़िल्म इस मुद्दे से जुड़ी कुछ सच्ची कहानियों को खंगालने का दावा करती है। कैसी है फ़िल्म आइये आपको बताते हैं।

कहानी
मंदगांव के केशव को बरसाने की जया से प्रेम हो जाता है, उसके गांव में शौचालय को नीच समझ घर से दूर शौच को रीति के अनुसार माना जाता है, पर सतयुग की रीति कलयुग में कुरीति बन जाती है, इसका आभास पूरे गांव को तब लगता है जया इस पर आक्रोश प्रकट कर अपना ससुराल त्याग देती है, और केशव प्रण लेता है कि वो अब इस कुरीति को खत्म करेगा।

 

रेटिंग : ***१/२

 

समीक्षा
ऐसी फिल्में और बननी चाहिए , ऐसी कहानियां समाज के हर तबके को देश में फैली कुप्रथाएं के खिलाफ डंका बजाती है। फ़िल्म की कहानी सत्य घटनाओ पर आधारित है और सत्य घटनाओ का रूपनतंरण अच्छी तरह से किया गया है। फ़िल्म के मधायम से जनजागरण होना अच्छी बात है और होना भी चाहिए, वरना कभी पता नहीं चलेगा कि टॉयलेट जैसी मूल जरूरत पर सरकार द्वारा दी हुई सहूलियत कब सकेम बन जाती है और सरकार और फीता शाही के मुलाज़िम उस सहूलियत को डकार कर जाते हैं। फ़िल्म सिम्पल है , ये इसका अच्छा हिस्सा है पर अंत तक आते आते ये फ़िल्म बेतरतीव तरीके से चलने लगती है,पर कहते हैं अंत भला तो सब भला, अपने राजनीतिक नीतियों के महिमामंडन बनते बनते इसकी सच्ची कहानी इसे पटरी पर रखने की कोषिश करती है और काफी हद तक सफल भी रहती है। पर फ़िल्म में कमियां भी हैं,मंतव्य बहुत अच्छा है पर फ़िल्म मात खाती है अपनी जरूरत से लंबी पटकथा पर, जो बात 2 घंटे में कही जा सकती थी उसकी बखान में 40 मिनट ज़्यादा लगा दिए जाते हैं।  फ़िल्म के संवाद बेहतर हो सकते थे। फ़िल्म का कलर करेक्शन और वीएफएक्स निचले दर्जे का है। फ़िल्म का सम्पादन भी लचर है।

 

अदाकारी
भूमि इस फ़िल्म की जान हैं, वो यशराज कास्टिंग टीम से निकली सबसे प्रतिभा शाली अभिनेत्रियों में से एक है। अक्षय ने इस फ़िल्म में एक बढ़िया और अवार्डनॉमिनेशन के लायक पेरफॉर्मन्सेस दिया है। दिव्येन्दु का ये रोल उनका अब तक का दूसरा सबसे मनोरंजक रोल है।

 

 

 

संगीत
मुझे कुछ खास अच्छा नहीं लगा, पगली प्यार हो जाएगा फ़िल्म में इतनी दफा इस्तेमाल हुआ है, की चिढ़ सी होने लगती है। पार्श्वसंगीत भी सो सो ही है।

 

कुल मिलाकर ये एक अच्छी फैमिली फ़िल्म है और इसकी कहानी वो कहानी है जो सुनानी चाहिए।

 

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