जिनके चुने जाने पर अमेरिका में बज गई घंटी

By: Shweta Mishra | Publish Date: Sun 19-Mar-2017 12:03:03
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जिनके चुने जाने पर अमेरिका में बज गई घंटी
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट नेता इलमकुलम मनक्कल शंकरन नंबूदरीपाद सिर्फ नाम से ही नहीं बल्‍कि अपने कामों से भी बड़े थे। 19 मार्च, 1998 को इस दुनिया को अलविदा कहने वाले नंबूदरीपाद समाजवादी मार्क्सवादी विचारक थे। आज भी लोग इन्‍हें इनके समाजहित के कामों और फैसलों के लिए याद करते हैं। कहते हैं कि पूंजीवादी नीति के विरोधी होने की वजह से जब यह केरल के मुख्‍यमंत्री बने थे तब अमेरिका जैसे देश को झटका पहुंचा था। वहां घंटी बज गई थी। ऐसे में आइए आज इनकी पुण्‍यतिथि पर जानें इनके जीवन से जुड़ी कुछ खास बातें...

परवरिश मां ने किया:
ई.एम.एस. नंबूदरीपाद 14 जुलाई, 1909 को केरल के पालघाट जिल में जन्‍में थ्‍ो। बचपन में इनके पिता की मृत्‍यु हो जाने से इनकी परवरिश इनकी मां ने किया था। नंबूदरीपाद ने संस्कृत का अध्ययन करते हुए अपनी प्रारंभिक शिक्षा पलघाट और त्रिचुर से प्राप्त की थी।

राजनीति की ओर रुख किया:

नंबूदरीपाद बचपन से ही सामाज के लिए कुछ खास करने के लिए यह तत्‍पर रहते थ्‍ो। वह एक समाजवादी मार्क्सवादी विचारक, क्रांतिकारी, लेखक, इतिहासकार के रूप में जाने गए। राजनीति में रुचि होने से वह बड़े होकर राजनीति की ओर रुख कर गए।

कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य:
1932 में 'सविनय अवज्ञा आन्दोलन' से जुड़ने वाले नंबूदरीपाद को तीन वर्ष की सजा सुनाई गयी थी। हालांकि वह 1933 में रिहा हो गए थे। 1937 वह कांग्रेस के टिकट पर मद्रास विधान परिषद में चुने गए थे। इसके बाद सन 1940 में यह कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य चयनित हुए।

पहले कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री:

1957 में यह केरल विधानसभा के सदस्य बनने के साथ ही प्रदेश के पहले कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री बने थे। यह इस पर 5 अप्रैल, 1957 से 31 जुलाई, 1959 तक रहे क्‍योंकि इसके बाद इनकी सरकार बर्खास्त कर हो गई थी।

एक फिर मुख्‍यमंत्री बने:

जिससे 1960 के मध्यावधि चुनाव के बाद वे विधान सभा में विरोधी दल के नेता बन कर बैठै। इसके बाद यह एक फिर मुख्‍यमंत्री बने थे। इस दौरान  6 मार्च, 1967 से 1 नवम्बर, 1969 तक इन्‍होंने कार्य संभाला था। 1977 में वे माकपा के महासचिव बने थ्‍ो।

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जनसंघर्षों की जमीन तैयार:
इनके शासन काल में सामंतवाद विरोधी लोकतांत्रिक जनसंघर्षों की जमीन तैयार हुई। इन्होंने पिछड़ी जातियों की जनता और पिछड़े समुदायों से निकले पूंजीपति वर्ग के बीच में अंतर किया। इसके बाद जबरदस्त बहस छेड़ दी। जिसमें उन्‍हें सफलता भी मिली थी।  

पूंजीवादी नीति के खिलाफ:
इतना ही नहीं इन्‍होंने पूंजीवाद को समाप्‍त करने के लिए अथक प्रयास भी किए। वह अमेरिका की इस पूंजीवादी नीति के खिलाफ थे। शायद तभी इनके सीएम बनने पर अमेरिका में घंटी बज गई थी। इनके नेतृत्‍व में खेतिहर मज़दूरों और छोटे बटाईदारों को प्रमुखता मिली।

जमीदारी के खात्‍मे के लिए:
इसके अलावा नंबूदरीपाद को जमीदारी के खात्‍मे के लिए भी जाना जाता है। कहा जाता है कि जमींदार परिवार में पैदा होने के कारण नंबूदरीपाद ने उत्तराधिकार में मिली सारी सम्पत्ति पार्टी को सौंप दी। नंबूदरीपाद ने केरल में कृषि प्रश्न की मौलिक व्याख्या लोगों के बीच की।

अंग्रेजी के प्रसिद्ध रचनाकार:

नंबूदरीपाद मार्क्‍सवादी नेता होने के साथ ही मलयालम और अंग्रेजी के प्रसिद्ध रचनाकार भी थे। अंग्रेजी में द नेशनल क्योश्चशन इन केरला, गांधी एण्ड हिन्दुज्म और द विसेन्ट क्योश्चन इन केरला जैसी उनकी कई रचनाएं भी काफी फेमस हुई थीं।

पहला पूर्ण साक्षर राज्‍य:
नंबूदरीपाद के नेतृत्‍व में ही केरल भारत का पहला पूर्ण साक्षर राज्य बना था। बेमिसाल ईमानदारी के परिचायक ईमानदारी बेमिसाल ने 19 मार्च, 1998 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया था, लेकिन आज भी लोग उनके संघर्षों से सीख लेने का उदाहरण देते हैं।

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