वारदातों में फॉरेंसिक जांच कराने से क्‍यों कतराती है हमारी पुलिस? सच कर देगा परेशान

By: Inextlive | Publish Date: Mon 04-Dec-2017 03:37:02   |  Modified Date: Mon 04-Dec-2017 03:38:17
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वारदातों में फॉरेंसिक जांच कराने से क्‍यों कतराती है हमारी पुलिस? सच कर देगा परेशान
- सिर्फ बड़ी वारदातों में पीडि़त को तसल्ली देने के लिए भेजी जाती फील्ड यूनिट - टीम के पहुंचने से पहले ही घटना स्थल से हो चुकी होती है छेड़छाड़ - वारदात में मामला बिगड़ता देख पुलिस लेती है फॉरेंसिक एक्सपर्ट की मदद

GORAKHPUR: पुलिस घटनाओं का भले ही ताबड़तोड़ खुलासे कर रही है, लेकिन यह खुलासे बदमाशों को सजा दिलाने के लिए काफी नहीं है. क्योंकि पुलिस ऐसे मामलों में अभियुक्त को सजा दिलाने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं जुटा पाती. इसका फायदा उठाकर बदमाश जमानत पर छूट फिर घटनाओं को बेखौफ होकर अंजाम दे रहे हैं. इसका खुलासा हुआ है दैनिक जागरण आई नेक्स्ट की पड़ताल में. हमारी टीम ने ऐसे मामलों की पड़ताल की तो पता चला कि चोरी या बड़े मर्डर के केस के अलावा पुलिस जल्दी फॉरेसिंक टीम की मदद ही नहीं लेती. हालांकि जिन मामलों में फॉरेसिंक टीम मौके पर पहुंचकर जांच करती है, उन जगहों से टीम के एक्सपर्ट फिंगर प्रिंट के अलावा अन्य भी कई ठोस सबूत लेकर पुलिस को मुहैया करा देते हैं. बावजूद इसके पुलिस फॉरेंसिक एक्सपर्ट की मदद लेने से कतराती है.

 

साक्ष्य की कमी का बदमाश उठा रहे फायदा

नाम न छापने की शर्त पर एक अधिकारी ने बताया कि घटना के खुलासे के समय अगर पुलिस घटना के समय ली गई फिंगर प्रिंट या एक्सपर्ट द्वारा लिए गए अन्य नमूनों का मिलान कर कोर्ट में पेश करे तो यह आरोपी को सजा दिलाने के लिए पर्याप्त होगा. लेकिन आम तौर पर पुलिस सिर्फ बड़ी चोरी या हत्या की वारदात के अलावा अन्य किसी भी घटना के समय एक्सपर्ट की मदद नहीं लेती. यही वजह है कि इस साल 2017 में अब तक गोरखपुर के विधि विज्ञान प्रयोगशाला के एक्सप‌र्ट्स ने 210 घटनाओं की जांच की और इनमें से अधिकांश की रिपोर्ट पुलिस को सौंप दी. वहीं इनमें से 30 ऐसी घटनाएं हैं, जिनमें एक्सपर्ट की टीम पुलिस के बिना बुलाए ही सूचना पाकर मौके पर पहुंचकर नमूने कलेक्ट किए हैं. हालांकि इस करीब 11 महीने के दौरान शहर में चोरी, लूट, हत्या जैसी वारदातें तो बहुत हुई, लेकिन इनमें से तमाम मामलों में पुलिस ने पर्याप्त साक्ष्य जुटाने की जहमत नहीं उठाई.

 

दिखावा साबित होती है फॉरेंसिक जांच

वहीं देखा जाए तो जिन घटनाओं में फील्ड यूनिट टीम पहुंचकर मामलों की जांच भी करती है, वह महज पीडि़त परिवार के लिए एक दिखावा ही साबित होता है. क्योंकि एक्सपर्ट टीम के मुताबिक उन्हें सही और ठोस साक्ष्य तभी मिलता है, जब घटना के बाद घटना स्थल से छेड़छाड़ न की गई हो. यानी कि उस जगह को किसी अन्य ने न छूआ हो, लेकिन एक्सपर्ट के मुताबिक अधिकांश मामलों में जिनमें पुलिस टीम की मदद लेती भी है तो उसमें घटना के काफी समय बीत जाने के बाद फील्ड यूनिट को इसकी सूचना दी जाती. ऐसे में टीम के पहुंचने से पहले ही घटना स्थल से छेड़छाड़ हो चुकी होती है. ऐसे में कई बार चाहकर भी टीम वहां से सही प्रिंगर प्रिंट के नमूने नहीं ले पाती. ऐसे में फील्ड यूनिट व डॉग स्क्वायड की यह जांच पीडि़त के लिए पुलिस का मजह एक दिखावा ही साबित हो रही है.


बेगुनाह को नहीं भेज सकेंगे जेल

वहीं विधि विज्ञान प्रयोशाला से जुड़े सूत्रों के मुताबिक कम से कम मामलों में फील्ड यूनिट टीम की मदद लेने की भी एक खास वजह है. पुलिस की कोशिश रहती है कम से कम मामलों मे एक्सपर्ट को बुलाया जाए. सूत्र बताते हैं कि अगर सभी घटनाओं में टीम प्रिंगर प्रिंट आदि के नमूने लेने लगेगी तो उसके खुलासे के वक्त नमूने से आरोपी का मिलान कराना पड़ेगा. ऐसे में प्रिंगर प्रिंट रिपोर्ट के रहते हुए पुलिस किसी अन्य पर आरोप थोपकर उसे जेल नहीं भेज सकेगी, क्योंकि जेल गया व्यक्ति यह दावा करेगा कि घटना स्थल से लिया गया नमूना उससे मिलान कराया जाए. वहीं अगर पुलिस सही आरोपी को गिऱफ्तार कर घटना का पर्दाफाश करती है तो फील्ड यूनिट के साक्ष्य आरोपी को सजा दिलाने के लिए पर्याप्त साबित होंगे.

 

टीम को नहीं मिल पाती घटना की सूचना

इतना ही नहीं किसी घटना के दौरान संबंधित थाने की पुलिस या फिर पुलिस के अधिकारी फील्ड यूनिट टीम को घटना की सूचना न दें तो उन्हें जल्दी इसकी सूचना भी नहीं मिल पाती. क्योंकि टीम के पास सबकुछ होते हुए भी सूचनाओं का स्रोत नहीं है. बावजूद इसके सोशल मीडिया के दौड़ में जिन मामलों की जानकारी टीम को लग जाती, वह वहां खुद ही पहुंचकर जांच कर लेते हैं. यही वजह है कि इन बीते ग्यारह महीनों के दौरान 210 मामलों में से 30 मामलों में टीम बिना पुलिस के सूचना दिए ही पहुंचकर घटना स्थल की जांच की.


कुछ थानों को कभी नहीं पड़ती जरूरत

हैरानी वाली बात तो यह है कि शहर में हुई बड़ी वारदात से लेकर ग्रामीण एरिया की बड़ी घटनाओं में तो फील्ड यूनिट टीम को बुलाया जाता है, लेकिन जिले के कुछ ऐसे थाने हैं जहां घटनाएं तो तमाम होती हैं, लेकिन उन्हें कभी फॉरेंसिक टीम की जरूरत नहीं पड़ती. सूत्रों के मुताबिक गोरखपुर के बेलघाट और हरपुरबुदहट थानों की पुलिस को कभी घटनाओं में फॉरेंसिक जांच कराने की जरूरत ही नहीं पड़ती, यही वजह है कि इन दोनों थाना एरिया में टीम को गए जमाना बीत गया.

 

फील्ड यूनिट में लिए जाते हैं यह नमूने

- घटना स्थल से आरोपी के फिंगर प्रिंट

- घटना स्थल पर मौजूद रहने वालों के फूट प्रिंट

- घटना स्थल पर बिखरे ब्लड का सैंपल

- रेप के केस में ब्लड या स्पर्म का सैंपल

- घटना स्थल पर मौजूद किसी तरह का तरल पदार्थ

- घटना स्थल पर मौजूद गन पाउडर, बुलेट या खोखे का सैंपल

- घटना स्थल पर मौजूद घटना में प्रयुक्त किसी भी सामान का सैंपल

 

फील्ड यूनिट टीम में हैं इतने लोग

गोरखपुर जिले की फील्ड यूनिट टीम में फिलहाल करीब छह लोग शामिल हैं. इनमें मुख्य वैज्ञानिक अधिकारी, प्रयोगशाला अधिकारी, प्रयोगशाला सहायक, दो अन्य सहायक और कैमरा पर्सन