लान्सेट का ये शोध अपनी तरह का सबसे बड़ा शोध है जिसमें दुनिया भर के 200 देशों के आंकड़ों के आधार पर नतीजा निकाला गया है

यूके में 5 से 9 साल की उम्र के हर 10 बच्चे में से एक बच्चा मोटापे का शिकार है।

मोटे बच्चे बड़े होकर भी मोटे ही रहते हैं। इस वजह से बड़े होने पर ऐसे लोगों में बीमारियों का ख़तरा बढ़ जाता है।

विश्व मोटापा दिवस पर जारी रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 तक मोटापे की वजह से होने वाली बीमारियों के इलाज़ पर दुनिया 920 अरब पाउंड खर्च करेगी।

 

मोटापा है नया 'ट्रेन्ड'

इंपीरियल कॉलेज लंदन के शोधकर्ता प्रोफ़ेसर माज़िद इज़ीती के मुताबिक, ब्रिटेन सहित कई यूरोपीय देशों में बच्चों में मोटापे की दर अब स्थिर हो गई है लेकिन दुनिया के कई दूसरे देशों में अब भी बच्चों में मोटापा ख़तरनाक दर से बढ़ रहा है।

शोधकर्ताओं का मानना है कि सस्ते और मोटापा बढ़ाने वाली खाने की चीज़ों के प्रचार की वजह से दुनिया में मोटापा बढ़ रहा है।

मोटे बच्चों की संख्या फिलहाल सबसे ज्यादा पूर्वी एशिया में बढ़ी है। चीन और भारत में ऐसे बच्चों की तादाद 'गुब्बारे की तरह' बढ़ती जा रही है।

शोधकर्ताओं की मानें तो अगर इसी दर से बच्चों में मोटापा बढ़ता रहा, तो वो दिन दूर नहीं जब दुनिया में 'अंडरवेट' बच्चों से ज्यादा मोटे बच्चों की संख्या होगी।

साल 2000 के बाद दुनिया में 'अंडरवेट' बच्चों की संख्या लगातार घट रही है।

2016 में दुनियाभर में तकरीबन 19 करोड़ बच्चे 'अंडरवेट' थे। हालांकि ये संख्या मोटे बच्चों से ज्यादा थी, लेकिन ताज़ा आंकड़ों के बाद लगता है कि ये तस्वीर भी जल्द बदल जाएगी।

बच्चों में खतरनाक तरीके से बढ़ रहा है मोटापा


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पूर्वी एशिया, लैटिन अमरीका और कैरिबियन देशों में पिछले कुछ सालों में 'अंडरवेट' बच्चों से ज्यादा मोटे बच्चों की संख्या बढ़ी है।

लंदन स्कूल ऑफ हायज़ीन एंड ट्रापिकल मेडिसिन के सह-शोधकर्ता डॉ हैरी रूटर ने बीबीसी को बताया, "यह एक बड़ी समस्या है जो आगे और बदतर होती जाएगी।"

उनके मुताबिक, "यहां तक की पतले लोग भी दस साल पहले की तुलना में ज्यादा मोटे हो रहे हैं।"

विश्व स्वास्थ्य संगठन की डॉ फियोना बुल के मुताबिक, अब वक्त आ गया है जब हमें ज्यादा कैलोरी और कम पोषक तत्व वाले भोजन के बजाय ज्यादा शारीरिक सक्रियता पर ध्यान देने की ज़रूरत है।


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अब तक दुनिया भर में केवल 20 देशों ने सॉफ्ट ड्रिंक पर 'कर' लगाया है।

इंग्लैंड में पब्लिक हेल्थ से जुड़ी न्यूट्रीशन एक्सपर्ट डॉ एलिसन टेडस्टोन कहतीं हैं, "खाने में चीनी की मात्रा का कम से कम इस्तेमाल हो, इस पर हमारा कार्यक्रम दुनिया में सबसे अच्छा माना जाता है। लेकिन यह एक पीढ़ी की

चुनौती से निपटने के लिए एक लंबी यात्रा की शुरुआत भर है।"

साफ है कि केवल लोगों को बोलने भर से काम नहीं चलेगा। शिक्षा और जानकारी दोनों महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन कम कैलोरी और पौष्टिक आहार वाले भोजन को हमें अपने जीवन में शामिल करना उससे भी ज्यादा ज़रूरी है।"

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