क्त्रन्हृष्ट॥ढ्ढ : रांची जिले के डीईओ रतन माहावार और डीएसई शिवेन्द्र कुमार पर गाज गिर सकती है. मामला स्कूलों के विलय, शिक्षकों के विलय व अन्य अनियमितताओं से संबंधित बताया जा रहा है. दोनों अधिकारियों के खिलाफ मुख्य सचिव सुधीर त्रिपाठी के पास शिकायत भी की गयी है जिसपर जल्द ही कार्रवाई की जा सकती है. मालूम हो कि सरकार के आदेश को ताक पर रख शिक्षा विभाग ने अभी तक राजधानी के स्कूलों के शिक्षकों के विलय प्रक्रिया को पूरा नहीं किया जबकि कई जिलों में इसे पूर्ण कर दिया गया है. वहीं स्कूलों के विलय में भी रांची जिला काफी लेट रहा है.

मई में जारी किए थे निर्देश

सरकार ने मई माह में ही निर्देश जारी किया था कि जुलाई के पूर्व सभी स्कूलों की ग्रेडिंग की जानी चाहिए ताकि स्कूलों में रिक्त शिक्षकों के पदों को भरा जा सके. साथ ही स्कूलों में चल रही पढ़ाई और अन्य गुणवत्ता के अनुसार ग्रेडिंग होने से नियंत्रण और योजनाओं को लागू करना आसान हो जाएगा. सभी स्कूलों की तीन ग्रेडों ए, बी और सी में बांटा जाना है जिसके बाद शिक्षकों का विलय किया जाएगा.

पुनर्गठन की प्रक्रिया लगभग समाप्त

रांची के सरकारी स्कूलों के पुनर्गठन की प्रक्रिया अब लगभग समाप्त होने के कगार पर है.वैसे इलाके जहां दो स्कूलों के बीच की दूरी कम हो, छात्र छात्राओं की संख्या में काफी कमी हो, विद्यालय भवन जर्जर हो रहे हों आदि के आधार पर स्कूलों को मर्ज करने की प्रक्रिया की गयी है.जिला में करीब 2466 स्कूल थे जिनमें 366 स्कूलों का पुनर्गठन हो गया, जिसके बाद राजधानी में 2100 के करीब स्कूल हो गए हैं.

शिक्षकों के विलय प्रक्रिया के लिए फिर मिला डेडलाइन

स्कूलों के पुनर्गठन के बाद अब शिक्षकों के पुनर्गठन की प्रक्रिया चल रही है.पारा टीचर्स को पंचायत के अन्य विद्यालयों में तथा सरकारी टीचर्स को जिला के दूसरे विद्यालयों में स्थानांतरण किया जा रहा है. शिक्षा विभाग छात्र-छात्राओं और शिक्षकों की संख्या के अनुपात में शिक्षकों का पुनगर्ठन कर रहा है लेकिन इसमें लागातार हो रही देरी के कारण इन्हें लास्ट डेडलाइन दिया गया है.

हालात भयावह, विगत वर्ष मात्र 40 स्कूल ए ग्रेड में

सरकारी स्कूलों में शिक्षा के स्तर का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि विगत वर्ष मात्र 40 स्कूलों को ए श्रेणी में रखा गया था जबकि 2400 से ज्यादा स्कूल बी ग्रेड व सी ग्रेड में रखे गए थे. इस वर्ष ग्रेडिंग नहीं हो पाने से अनुदान से लेकर अन्य सारी सुविधाएं विद्यार्थियों तक पहुंचने में काफी विलंब हो सकता है.