- 1947 में अफ्रीका के जंगल में एक लंगूर की जांच में मिला था वायरस

- 1954 में नाइजीरिया के एक व्यक्ति में पाया गया

- 2007 में अफ्रीका और एशिया में सबसे अधिक मामले आये

- 22 मरीज राजस्थान में मिले

-जीका वायरस को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग ने जारी किए निर्देश

-लक्षण मिलने पर कराई जाएगी केजीएमयू की लैबोरेटरी में जांच

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LUCKNOW:

राजस्थान के जयपुर में अब तक 22 मरीजों में जीका वायरस की पुष्टि होने के बाद यूपी सरकार ने भी प्रदेश में अलर्ट जारी कर दिया है. स्वास्थ्य विभाग ने अलर्ट जारी करते हुए प्रदेश के सभी मुख्य चिकित्सा अधिकारियों और अस्पतालों के मुख्यचिकित्सा अधीक्षकों को निर्देश जारी किए हैं. साथ ही कहा है कि राजस्थान से आने वाले सभी लोगों की स्क्रीनिंग की जाए. इसके लिए एयरपोर्ट अथॉरिटी को भी दिशा निर्देश जारी कर मरीजों की समय से पहचान करने को कहा गया है.

केजीएमयू बना नोडल सेंटर

स्वास्थ्य महकमे के संक्रामक रोग महकमे की ओर से जीका वायरस से संक्रमण के लक्षण, जांच का तरीका, इलाज केदिशा-निर्देश हुए जारी किए हैं, जिससे संदिग्ध मरीजों को आसानी से पहचाना जा सके. निर्देश में एयरपोर्ट अथॉरिटी से कहा गया है कि जयपुर या अन्य जीका वायरस से प्रभावित प्रदेशों या देशों से आने वाले संदिग्ध मरीजों की पहचान की जाए. लक्षण मिलने पर मरीज की केजीएमयू में जांच की जाए. केजीएमयू को वायरस की जांच के लिए नोडल सेंटर बनाया गया है. केजीएमयू में बनी अपेक्स लैबोरेटरी में सभी प्रकार के वायरस की जांच की जा सकती है.

कोट

जीका वायरस से घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन इसे फैलने से रोकने के लिए सीएमओ, सीएमएस को निर्देश जारी किए गए हैं.

डॉ. मिथलेश चतुर्वेदी, निदेशक, संक्रामक रोग

गर्भवती को खतरा अधिक

स्वास्थ्य महकमे के संचारी रोग विभाग की निदेशक डॉ. मिथलेश चतुर्वेदी ने बताया कि जीका वायरस से संक्रमित लोगों में डेंगू बुखार की तरह ही लक्षण होते हैं. बुखार, जोड़ो का दर्द, शरीर पर लाल चकत्ते, थकान, सिर दर्द, आंखों का लाल होना जैसी समस्याएं होती हैं. इस वायरस से गर्भवती महिलाओं के संक्रमित होने की ज्यादा संभावना रहती है. इसके ग्रसित होने के कारण बच्चे जन्म से ही आकार में छोटे और अविकसित दिमाग के होते हैं. ये स्थिति गर्भावस्था में जीका वायरस के संक्रमण केकारण होती है. इससे बच्चे में जन्मजात अंधापन, बहरापन भी हो सकता है और उसके नर्वस सिस्टम पर भी प्रभाव पड़ता है जिससे बच्चे में लकवा होने की संभावना अधिक होती है. मरीजों को पैरासीटामाल देकर घर पर ही आराम करने की सलाह दी जाती है.

मच्छरों से फैलता है जीका

डेंगू, मलेरिया और चिकुनगुनिया की तरह ही जीका वायरस भी मच्छरों से ही फैलता है. यह भी मुख्यत: एडीज नाम के मच्छर से फैलता है. यह दिन में भी एक्टिव रहता है. मच्छर के माध्यम से ही बीमारी एक मरीज से दूसरे में फैलती है इसलिए ऐसे मरीजों से थोड़ा अलग रहें. यदि यह मच्छर किसी जीका वायरस संक्रमित वाले व्यक्ति को काट लेता है तो वायरस मच्छर के खून में पहुंच जाता है. जब यह मच्छर किसी स्वस्थ्य व्यक्ति को काटता है तो उसे बीमारी हो जाती है.

अब तक कोई उपचार नहीं

डॉक्टर्स के अनुसार जीका वायरस के लिए अब तक कोई वैक्सीन नहीं है. न ही अब तक इसके लिए कोई इलाज ढूंढ़ा जा सका है, लेकिन बीमारी होने पर बुखार आता है और इससे बचाव के लिए लोगों को पैरासीटामाल टेबलेट दी जाती है.

बचाव के लिए ये करें

जीका वायरस को फैलाने वाले मच्छर से बचने के लिए वही उपाय हैं जो डेंगू, मलेरिया से बचाव के लिए हैं.

- हमेशा मच्छरदानी का प्रयोग करें.

- आस पास पानी को ठहरने नहीं दे.

- साफ सफाई रखें

- पूरी बांह के कपड़े पहनें

- बच्चों व अन्य लोगों का भी ध्यान रखें.

- खून बिना जांच कराए न चढ़वाएं.

कहां से आया जीका वायरस

जीका का संबंध अफ्रीका के जीका जंगल से है. यहां पर 1947 में रिसर्च कर रहे वैज्ञानिकों ने एक लंगूर की जांच की तो उसमें ये वायरस मिले थे, जिन्हें जीका नाम दिया गया. इसके बाद ये नाइजीरिया के एक व्यक्ति में 1954 में पाया गया. पहली बार 2007 में अफ्रीका और एशिया में सबसे अधिक मामले देखने को मिले थे. अब राजस्थान के जयपुर में 22 मामले एक साथ पाजिटिव आए हैं.