- 90 वर्ष का सफरनामा चुनौतियों भरा रहा

आगरा. भारत रत्‍‌न पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजयेपी को राजनीति का पुरोद्धा कहा जाता है. जमीनी सफर से शुरूआत करने वाले वाजपेयी को उनके सौम्य, सरल स्वभाव के लिए जाना जाता है, लेकिन शायद ही कोई यह जानता होगा, कि भारत रत्‍‌न ने किन परिस्थितियों में अपने बाल्यकाल को जिया. आईनेक्स्ट की टीम ने उनके जन्म दिवस की पूर्व संध्या पर उनकी यादों के झरोखों को जब खंगाला, तो एक ऐसी हकीकत सामने आई, जो पूर्व प्रधानमंत्री को व्यक्ति्तव को और भी बड़ा करती है. उनके पैतृक मकान में आज भी उनकी बचपन की यादें झांका करती हैं. हालांकि जिस घर में बचपन बीता था, अब वहां खंडहर बाकी है. बताते हैं कि गांव में बाढ़ आती थी, तो उनका परिवार गांव को छोड़कर ग्वालियर जाने के लिए मजबूर हुआ. इस गांव के स्कूल में उन्होंने प्राइमरी तक की पढ़ाई की थी.

आज है उनका जन्मदिन

राजनीति के अजातशत्रु कहे जाने वाले पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी आज 91वें वर्ष में प्रवेश करेंगे. भारत का प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके पैतृक गांव में जो खुशी थी, वो आज 25 दिसम्बर को लोगों के चेहरे पर देखी जा सकती है. स्थानीय लोगों के जेहन में वाजपेयीजी के बाह-बटेश्वर आगमन की यादें आज भी तरोताजा हैं.

ऊंचा टीला बयां करता है बुलंद इरादे

जिस ऊंचे टीले पर मकान था, वो उनके बुलंद इरादों की कहानी को बयां करता है. एक छोटे से गांव से शुरू हुआ सफर इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में दर्ज हो गया. भारत रत्‍‌न का बचपन बटेश्वर में बीता था. गांव के पैतृक मकान के लिए जाने वाले के लिए घुमावदार रास्ता था. उनके पिता पंडित कृष्ण बिहारी वाजपेयी और मां कृष्णा वाजपेयी इसी परिवार में रहा करते थे. घर के सामने एक मंदिर था, जहां पूजा-अर्चना होती थी. मौजूद समय में वहां सिर्फ दीवार का टुकड़ा बाकी है. वहां देवताओं का चबूतरा बनाया गया. पिता पं.कृष्ण बिहारी वाजपेयी ग्वालियर में शिक्षक थे और बाद में ग्वालियर बस गए.

देश सेवा के लिए रहे समर्पित

उनके परिवार के लोगों ने बताया कि 25 दिसम्बर 1924 को अटल बिहारी का जन्म हुआ था. प्राइमरी तक गांव में पढ़ाई करने के बाद ग्वालियर पहुंचे, लेकिन इस दौरान उनका बटेश्वर आना-जाना लगा रहा. उन्होंने देश सेवा के लिए विवाह नहीं किया. बीए ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज से किया और कानपुर के डीएवी कॉलेज से राजनीति शास्त्र में एमए पास किया. बाद में अपने पिता पं कृष्ण बिहारी वाजपेयी के साथ लॉ की पढ़ाई की, लेकिन बीच में पढ़ाई छोड़ दी.

छात्र जीवन में जुडे़ संघ से

छात्र जीवन से ही वे संघ से जुड़ गए थे. बाद में उन्होंने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पं दीनदयाल के नेतृत्व में राजनीति का ककहरा सीखा. उन्होंने भारतीय जनसंघ की स्थापना की. 1968 से 73 तक वे राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे. 1955 में पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए. 1957 में उन्होंने फिर बलरामपुर लोकसभा सीट से भाग्य अजमाया. इस बार उन्हें जनसंघ के प्रत्याशी के रूप में सफलता प्राप्त हुई. मोरारजी देसाई की सरकार में वे 1977 से 1979 तक विदेश मंत्री रहे.

कुशल कवि और पत्रकार भी रहे हैं अटल

एक कुशल राजनीतिज्ञ के रूप में पहचान बनाने वाले अटल बिहारी वाजपेयी पत्रकार होने के साथ कवि हृदय भी हैं. उनकी मेरी इक्यावन कविताएं प्रसिद्ध हैं. उन्होंने पांचजन्य, राष्ट्रधर्म, वीर अर्जुन आदि पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया.

बाबा का सपना पूरा हो गया

उनकी भानेज बहू गंगा देवी ने बताया कि गांव बटेश्वर से जाने के बाद वाजपेयी जी छह अप्रैल 1999 में आए थे. इस मौके पर रातों-रात सीसी खरंजा बनकर तैयार हुआ था. उनकी भतीजी बहन केसरी ने टीका और माल्यार्पण कर स्वागत किया था. बाह-बटेश्वर रेल सेवा शुरू होने पर बेटा अतुल ने फोन पर कहा कि बाबा का सपना पूरा हुआ.

बाढ़ ने किया था परेशान

उनके परिवार के सदस्य राकेश वाजपेयी को उनके पुरखों ने जो बातें बताई थी आज भी उनके जहन में वे ताजा हैं. उन्होंने बताया कि गांव में बाढ़ की समस्या थी. इसलिए अटलजी का पूरा परिवार गांव को छोड़ने को विवश हुआ था.