इविवि पत्राचार संस्थान की सहायक निदेशक को बकाया वेतन देने का निर्देश

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा, विजिटर अनिश्चितकाल तक नहीं रोक सकते प्रस्ताव

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय के विजिटर को कार्यकारिणी परिषद के परिनियमावली में संशोधन प्रस्ताव को स्वीकृति देने से इंकार करने का अधिकार नहीं है और न ही वे अनिश्चित अवधि तक प्रस्ताव अपने पास रख सकते हैं. सीमित अवधि के लिए ही प्रस्ताव को रोक सकते हैं. विजिटर, कार्यकारिणी परिषद के प्रस्ताव की स्वीकृति दे सकते हैं अथवा पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकते हैं. यह आदेश जस्टिस पंकज मित्तल तथा सरल श्रीवास्तव की खण्डपीठ ने संस्थान की सेवानिवृत्त सहायक निदेशक रेखा सिंह की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है. याचिका पर अधिवक्ता योगेश अग्रवाल तथा भारत सरकार के अधिवक्ता अरविन्द गोस्वामी, रिजवान अली अख्तर व विश्वविद्यालय के अधिवक्ता नीरज त्रिपाठी ने बहस की.

कोर्ट का आदेश

मानव संसाधन विकास मंत्रालय इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पत्राचार संस्थान को विश्वविद्यालय से सम्बद्ध करने के प्रस्ताव को विजिटर के समक्ष दुबारा पुनर्विचार कर निर्णय के लिए रखे

विश्वविद्यालय संस्थान के सहायक निदेशक का बकाया वेतन दो माह में भुगतान करे

काम लेकर वेतन न देना बेगार कराना है

संविधान के अनुच्छेद 23 के अन्तर्गत न केवल प्रतिबन्धित किया गया है अपितु यह दंडनीय भी है

याची को भुगतान नहीं किया जाता तो जवाबदेह अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही की जायेगी

याची का कहना

लगातार कार्यरत रहते हुए 2017 में सेवानिवृत्त हुई

विश्वविद्यालय अधिनियम आने के बाद कार्यकारिणी ने परिनियमावली में संशोधन प्रस्ताव 6 साल पहले भेजा है

विजिटर की सहमति न मिलने से 2014 से वेतन भुगतान नहीं किया गया जबकि वह वेतन पाने की हकदार है

याची का कहना था कि बिना वेतन के काम लेना बेगार कराना है

यह अनुच्छेद 17, 23 व 24 के विपरीत है. सरकार का दायित्व है कि वह वेतन भुगतान सुनिश्चित कराये.

भारत सरकार का कथन

किसी भी प्रस्ताव पर सहमति देना विजिटर पर बाध्यकारी नहीं है

स्ववित्त पोषित संस्थान होने के नाते याची सरकार से वेतन की मांग नहीं कर सकती