-यूपी में एयर पॉल्यूशन के मामले में छठा सबसे प्रदूषित जिला है बनारस

-द क्लाइमेट एजेंडा संस्था की एयर किल्स की रिपोर्ट में हुआ खुलासा, काले धुएं की चपेट में है पूरा प्रदेश

-हवा में उड़ रहे धूल के कण लोगों के गले में उतर सांस की बढ़ा रहे समस्या

बनारस के एयर पॉल्यूशन का लेवल लगातार बिगड़ रहा है. यहां हर सांस में जहर है. हवा में उड़ रहे धूल के कण और गाडि़यों से निकलने वाले कार्बन लोगों के गले में उतर सांस की समस्या बढ़ा रहे हैं. बुजुर्ग व बच्चों के लिए तो यह बेहद खतरनाक साबित हो रहा है. बनारस समेत पूरा प्रदेश काले धुएं की चपेट में है. इस बात का खुलासा द क्लाइमेट एजेंडा संस्था की एयर किल्स की रिपोर्ट में हुआ है. उत्तर प्रदेश के 15 शहरों में कराए गए सर्वे की आई रिपोर्ट में बनारस को एयर पॉल्यूशन के मामले में छठा सबसे प्रदूषित जिला माना गया है. जबकि लखनऊ इससे 5 पायदान नीचे होते हुए 11वें नंबर पर है. वहीं पहले नंबर पर बलिया जबकि दूसरे व तीसरे नंबर पर मऊ और गाजियाबाद है.

वायु प्रदूषण की चपेट में प्रदेश

100 प्रतिशत यूपी अभियान के तहत द क्लाइमेट एजेंडा संस्था की ओर से जारी रिपोर्ट व विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार इस समय पूरा प्रदेश वायु प्रदूषण की चपेट में है. यूपी की आबोहवा अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा बिगड़ रही है. मुख्य अभियानकर्ता एकता शेखर ने शुक्रवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि यह यूपी के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के प्रदूषण लेवल की अब तक की पहली रिपोर्ट है. रिपोर्ट बताती है कि प्रदेश की आबोहवा में घुल रहा जहर केवल चार या पांच शहरों तक ही सीमित नहीं है.

जीने का अधिकार भी नहीं

सामाजिक कार्यकर्ता जागृति राही का कहना है कि क्लाइमेट एजेंडा द्वारा तैयार की गई इस रिपोर्ट में सरकारी तंत्र की कमजोरी उजागर हो रही है. आज भी केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा की जाने वाली एयर क्वालिटी जांच का दायरा सीमित है. वर्तमान में नेशनल ऐम्बियेंट एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग (नाकम) नेटवर्क के अंतर्गत यह जांच केवल 7 शहरों तक सीमित है. वायु प्रदूषण नियंत्रण के सन्दर्भ में यूपी का 90 फीसदी हिस्सा किसी तरह के उपायों से अछूता है. यहां अब आम आदमी के लिए स्वच्छ हवा में जीने का अधिकार भी नहीं रहा.

जो चर्चा में नहीं वहां भी पॉल्यूशन

जिला फोरम के सदस्य प्रमिल द्विवेदी ने बताया कि रिपोर्ट में उन जगहों को अधिक प्रदूषित पाया गया है जहां केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के नेटवर्क के तहत निगरानी नहीं की जाती. बनारस से ज्यादा बलिया, मऊ, आजमगढ़, गोरखपुर में एयर पॉल्यूशन का बढ़ता ग्राफ यह इशारा कर रहा है कि पूरा प्रदेश काले धुएं की चपेट में है.

एक नजर

-विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के आधार पर पूरा उत्तर प्रदेश भयंकर रूप से प्रदूषित है

वजहें हैं तमाम

-शहर की सड़कों पर दौड़ रहे 12 लाख वाहन प्रदूषण के बड़े कारण हैं

-सकरी सड़कों की वजह से लगने वाले भीषण जाम की वजह से गाडि़यां जहर उगलती हैं

-जेनरेटर के बढ़ते इस्तेमाल से भी शहर में प्रदूषण बढ़ रहा है

-कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो रहे शहर में हरियाली नाममात्र की है

-हरियाली न होने की वजह से प्रदूषण पर नियंत्रण नहीं हो पा रहा है

-कचरा जलाना और डीजल का उपयोग

-एयर पॉल्यूशन से निपटने के लिए राज्य में नीतिगत अभाव

-कचरा निस्तारण प्रणाली के अभाव में कचरा जला देना

-खेतों में पराली जलाना

इंडियन इंडेक्स के अनुसार पीएम 10 का स्तर 100 व पीएम 2.5 का स्तर 60 से ज्यादा नहीं होना चाहिए.

पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र होने के नाते बनारस महत्वपूर्ण सिटी है. लेकिन मुख्यमंत्री व पर्यावरण मंत्री के जिलों में भी वायु प्रदूषण के हालात लखनऊ व दिल्ली से भी बदतर हैं. इसलिए सरकार को इस बारे में ज्यादा सोचने की जरूरत है.

एकता शेखर, मुख्य अभियानकर्ता, द क्लाइमेट एजेंडा