40 प्रतिशत तक बढ़ गर्इ परिचालन लागत
मुंबर्इ (पीटीआर्इ)।
द कंफेडरेशन अाॅफ एटीएम इंडस्ट्री (सीएटीएमआर्इ) ने भारतीय रिजर्व बैंक से गुहार लगार्इ है। उसका कहना है कि आरबीआर्इ हस्तक्षेप करे ताकि घाटे में चल रहे एटीएम सेवा उद्योग को बचाने के लिए फीस ढांचे में तत्काल बदलाव किया जा सके। इसमें कहा गया है कि आरबीआर्इ के हाल के आदेश से उनकी लागत में 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो गर्इ है। दरअसल आरबीआर्इ ने अपने आदेश में कैश वेंडिंग मशीनों को कन्फिगर करने को कहा था। इंडस्ट्री ने यह भी कहा कि आरबीआर्इ के निर्देशों को पूरा करने के चक्कर में बैंकों पर अकेले बोझ पड़ेगा आैर इससे उनका परिचालन लागत 40 प्रतिशत तक बढ़ जाएगा।

नये नोट के लिए तैयारी का सर्कुलर जारी
21 जून को आरबीआर्इ ने एक सर्कुलर जारी करके एटीएम को बाजार में आ रहे नये नोटों के लिए अनिवार्य रूप से तैयार करने के निर्देश जारी किए थे। इसमें आरबीआर्इ ने एटीएम पर नियंत्रण बढ़ाने की भी बात कही थी। इंडस्ट्री का यह भी कहना था कि 2012 में 15 रुपये बतौर ट्रांजेक्शन फीस तय किए गए थे जोकि मौजूदा हालात में उचित नहीं है। यही वजह है कि हमें अब नुकसान उठाना पड़ रहा है। सीएटीएमआर्इ के महानिदेशक ललित सिन्हा ने कहा समाचार एजेंसी पीटीआर्इ कि व्हाइट लेबल एटीएम आॅपरेटर पहले से ही भयानक वित्तीय परेशानी में हैं। अब उन्हें आरबीआर्इ के निर्देशों के पालन के लिए अतिरिक्त निवेश करने की जरूरत है। इसके अलावा सुरक्षा के मानकों को पूरा करने से प्रति ट्रांजेक्शन लागत में कम से कम 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी।

23 रुपये प्रति ट्रांजेक्शन आता है खर्चा
उन्होंने कहा कि आरबीआर्इ को चाहिए कि सभी पक्षाें जिनमें बैंक आैर एटीएम सेवा प्रदाता शामिल हों, से बातचीत करके समस्या कोर्इ उचित रास्ता निकाला जाना चाहिए। यह दिक्कत नये निर्देशों के पालन से सामने आर्इ है, जिसका समाधान निकालना जरूरी है। उनका कहना था कि एटीएम में रोजाना 150 बार इस्तेमाल होने पर ट्रांजेक्शन लागत 23 रुपये बैठती है। जबकि अभी इसके लिए व्हाइट लेबल एटीएम सेवा प्रदाताआें को सिर्फ 15 रुपये दिए जाते हैं। 2012 में एटीएम से कैश लेनदेन के लिए 15 रुपये आैर नाॅन कैश ट्रांजेक्शन पर 5 रुपये का शुल्क निर्धारित कर दिया गया था। तबसे कर्इ बार अनुरोध करने के बावजूद यह शुल्क जस का तस बना हुआ है। साथ ही उन्होंने एटीएम पर नियंत्रण को लेकर आरबीआर्इ निर्देशों का स्वागत किया है। इससे बैंकों पर पड़ने वाला अतिरिक्त बोझ कुछ कम होगा।

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