नई दिल्ली (पीटीआई)। भारतीय मूल के बड़े लेखक और नोबेल पुरस्कार विजेता वीएस नायपॉल अब हमारे बीच नहीं रहे। 85 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपने लंदन स्थित आवास पर आखिरी सांसे ली। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सहित कई लोगों ने नायपॉल के निधन पर शोक जताया है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने ट्वीट किया कि उनके निधन से साहित्य जगत खासकर भारतीय-अंग्रेजी लेखन को बहुत नुकसान हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्विटर पर लिखा कि सर नायपॉल अपने व्यापक लेखन के चलते हमेशा याद किए जाएंगे। इतिहास, संस्कृति, उपनिवेशवाद और राजनीति से लेकर तमाम विषयों पर उन्होंने लिखा।

प्यारे बड़े भाई को खो दिया
ब्रिटिश भारतीय उपन्यासकार सलमान रश्दी ने भी उनके निधन पर शोक जताया, उन्होंने एक ट्वीट में कहा, 'हम सभी अपने जीवन, राजनीति और साहित्य को लेकर असहमत थे मुझे ऐसा लग रहा है जैसे कि मैंने अपने प्यारे बड़े भाई को खो दिया है। RIP विद्या।' हालांकि सिर्फ रश्दी ने ही नहीं दुनिया के तमाम लेखकों ने नायपॉल के निधन पर शोक जताया है। बता दें कि वीएस नायपॉल का पूरा नाम विद्याधर सूरज प्रसाद नायपॉल था। उनका जन्म 17 अगस्त, 1932 को त्रिनिडाड के चगवानस में एक हिंदू परिवार में हुआ था। उनकी पढ़ाई ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से हुई थी। उनका पहला उपन्यास 'द मिस्टिक मैसर' साल 1951 में प्रकाशित हुआ था।

30 से अधिक लिखी थीं किताबें
नायपॉल को 1971 में बुकर प्राइज से सम्मानित किया गया था। इसके अलावा उन्हें जबरदस्त लेखनी के लिए 2001 में साहित्य के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार भी दिया गया था। नायपॉल ने अपने जीवन में 30 से अधिक किताबें लिखी थीं, जिसमें 'द मिस्टिक मैसूर' (1955), 'द मिमिक मेन' (1967), 'इन ए फ्री स्टेट' (1971), 'गुरिल्लाज' (1975), 'ए बेंड इन द रिवर' (1979), 'ए वे इन व‌र्ल्ड' (1994), 'द इनिग्मा ऑफ अराइवल' (1987), 'बियॉन्ड बिलिफ : इस्लामिक एक्सकर्जन अमंग द कन्वर्टेड पीपुल्स' (1998), 'हाफ ए लाइफ' (2001), 'द राइटर एंड द व‌र्ल्ड' (2002), 'लिटरेरी ऑकेजन्स (2003), 'द नॉवेल मैजिक सीड्स' (2004) आदि उनकी मशहूर किताबों में शामिल हैं।

तीन साल लगे थे
उनकी किताब 'अ हाउस फॉर बिस्वास' और 'द बेंड इन द रिवर' काफी फेमस हैं। कहा जाता है कि 'अ हाउस फॉर मिस्टर बिस्वास' को लिखने में नायपॉल को तीन साल से अधिक समय लगे थे।

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नई दिल्ली (पीटीआई)। भारतीय मूल के बड़े लेखक और नोबेल पुरस्कार विजेता वीएस नायपॉल अब हमारे बीच नहीं रहे। 85 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपने लंदन स्थित आवास पर आखिरी सांसे ली। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सहित कई लोगों ने नायपॉल के निधन पर शोक जताया है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने ट्वीट किया कि उनके निधन से साहित्य जगत खासकर भारतीय-अंग्रेजी लेखन को बहुत नुकसान हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्विटर पर लिखा कि सर नायपॉल अपने व्यापक लेखन के चलते हमेशा याद किए जाएंगे। इतिहास, संस्कृति, उपनिवेशवाद और राजनीति से लेकर तमाम विषयों पर उन्होंने लिखा।

प्यारे बड़े भाई को खो दिया
ब्रिटिश भारतीय उपन्यासकार सलमान रश्दी ने भी उनके निधन पर शोक जताया, उन्होंने एक ट्वीट में कहा, 'हम सभी अपने जीवन, राजनीति और साहित्य को लेकर असहमत थे मुझे ऐसा लग रहा है जैसे कि मैंने अपने प्यारे बड़े भाई को खो दिया है। RIP विद्या।' हालांकि सिर्फ रश्दी ने ही नहीं दुनिया के तमाम लेखकों ने रश्दी के निधन पर शोक जताया है। बता दें कि वीएस नायपॉल का पूरा नाम विद्याधर सूरज प्रसाद नायपॉल था। उनका जन्म 17 अगस्त, 1932 को त्रिनिडाड के चगवानस में एक हिंदू परिवार में हुआ था। उनकी पढ़ाई ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से हुई थी। उनका पहला उपन्यास 'द मिस्टिक मैसर' साल 1951 में प्रकाशित हुआ था।

30 से अधिक लिखी थीं किताबें
नायपॉल को 1971 में बुकर प्राइज से सम्मानित किया गया था। इसके अलावा उन्हें जबरदस्त लेखनी के लिए 2001 में साहित्य के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार भी भी दिया गया था। नायपॉल ने अपने जीवन में 30 से अधिक किताबें लिखी थीं, जिसमें 'द मिस्टिक मैसूर' (1955), 'द मिमिक मेन' (1967), 'इन ए फ्री स्टेट' (1971), 'गुरिल्लाज' (1975), 'ए बेंड इन द रिवर' (1979), 'ए वे इन व‌र्ल्ड' (1994), 'द इनिग्मा ऑफ अराइवल' (1987), 'बियॉन्ड बिलिफ : इस्लामिक एक्सकर्जन अमंग द कन्वर्टेड पीपुल्स' (1998), 'हाफ ए लाइफ' (2001), 'द राइटर एंड द व‌र्ल्ड' (2002), 'लिटरेरी ऑकेजन्स (2003), 'द नॉवेल मैजिक सीड्स' (2004) आदि उनकी मशहूर किताबों में शामिल हैं।

तीन साल लगे थे
उनकी किताब 'अ हाउस फॉर बिस्वास' और 'द बेंड इन द रिवर' काफी फेमस हैं। कहा जाता है कि 'अ हाउस फॉर मिस्टर बिस्वास' को लिखने में नायपॉल को तीन साल से अधिक समय लगे थे।
 

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