कानपुर। मेरी माँ कहती है, 'अच्छी चीजों की ज्यादा तारीफ नहीं करनी चाहिए, नजर लग जाती है', मैं बहुत दिनों से खुशी से उछल रहा था कि कुछ अच्छी फिल्में आ रही हैं, तो लो जी, लग गई नजर। ठग्स के बाद ऐसी कि अब हर हफ्ते एक फिल्म आ रही है जिसे सही मायनों में बनना ही नहीं चाहिए था। इस हफ्ते आई है 'भैया जी सुपरहिट'.

रेटिंग : 1 STAR

कहानी :
रूठी हुई पत्नी को मनाने के लिए डॉन भैया जी बॉलीवुड में हीरो बनने चल पड़ते हैं, और ...

समीक्षा :
मुझे ये समझ मे नहीं आता है कि अगर फिल्म बनाई ही जा रही तो ऐसी कहानी पे फिल्म बनाने की ज़रूरत ही क्या है? किस तबके के लिए बन रही है इस फ़िल्म जैसी फ़िल्म में। 90 की दशक की बी ग्रेड फिल्मों की फील देती इस कहानी को झेलना हर किसी की बात नहीं और जोक्स का तो पूछिये ही नहीं इतने बासी जोक्स और सिटुटेशन्स इतनी बचकानी हैं कि आप अपने हॉल में होने पे अफसोस करते हैं। पता नहीं किस मूड में राइटर ने फ़िल्म लिखी है, सही भी है जहाँ एक ठीक ठाक सी कहानी को ठीक ठाक से राइटर को दिया होता तो फिल्म बेहतर बन सकती थी, पर जहाँ केवल फॉर्मिला नामक जूतों की माला दर्शकों को पहनाने की ठान ही ली है तो खाक कोई मेहनत करने की ज़रूरत है। ऑडिएंस को तो मूर्ख समझने की प्रथा बॉलीवुड में कब से चली आ रही है। फिल्म में हडडीतोड़ एक्शन है, कानफोड डायलॉग हैं, नाच गाना है बस कुछ मिसिंग है तो वो है फिल्म।

अदाकारी :
ये फिल्म का सबसे दुखद पार्ट है कि खराब राइटिंग और डायरेक्शन के चलते एक से बढ़ कर एक अच्छे एक्टर्स भी स्क्रीन पे कोई जादू नहीं जगा पाते हैं, सनी से लेकर संजय मिश्रा सब ऐसे साउंड करते हैं जैसे अपनी ही मिमिकरी कर रहे हों। किसी की मेहनत रंग नहीं ला पाती।

कुलमिलाकर फिल्म की कहानी वेलकम में नाना के रोल से मिलती होने के बावजूद फिल्म उससे अलग एक बेहद इरिटेटिंग फिल्म है और बेहद बासी कहानी के चलते जो जितना नुकसान ये एक्टर्स के टैलेंट का कर सकती थी, करती है। फिर भी सनी के भक्त हों तो कर सकते हैं भैया जी सुपरहिट के दर्शन



Review by Madhukar Pandey

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