- सोशल मीडिया पर कई दिन से एक्टिव थे दलित समाज के युवा

- न फोर्स लगाई और ना प्रदर्शनकारियों से निपटने का कोई प्लान

आगरा: भारत बंद का ऐलान था. मालूम सबको था. जिला प्रशासन भी जानता था. पुलिस भी अनजान नहीं थी. खुफिया तंत्र के पास भी यह खोज-खबर थी, लेकिन सियासी दबाव कहें अथवा कुछ और 'साजिश'. नतीजा बवाली रहा. कागजी अलर्ट जारी कर अफसरों ने अपना काम कर दिया. और हो गए बेफिक्र. पुलिस का अमला भी बेफिक्र था कि कुछ देर नारेबाजी होगी, फिर थम जाएगी, लेकिन जैसे-जैसे सूर्यदेव ने अपनी गरमी बढ़ाई, बवाल भी अपने शबाव पर पहुंच गया. अब अफसर फंस गए. उनके हाथ पैर फूल गए. अंदाजा न था कि मामला इतना तूल पकड़ेगा. कई घंटे बाद अफसरों में जोश आया. तब तक भीड़ उग्र हो गई. कई पुलिसकर्मी चोटिल हो गए.

सुरक्षा प्रतिमाओं तक सीमित

एससी-एसटी एक्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद से ही दलितों में बड़े प्रदर्शन की सुगबुगाहट थी. समाज के युवा खासतौर पर इसमें आगे थे. उन्होंने सोशल मीडिया पर एकजुटता का अभियान चलाया. पूरी प्लानिंग भी कर ली. कुछ खुफिया इनपुट पर रविवार को जारी हुआ अलर्ट केवल प्रतिमाओं की सुरक्षा करने तक ही सीमित रह गया. बंद के दौरान अराजक स्थिति होने पर कैसे निपटा जाएगा. इस पर न तो जिले के पुलिस ने सोचा न प्रशासनिक अफसरों ने कोई प्लानिंग की. लिहाजा बाजार खुलने के समय से पुलिस की ड्यूटी भी नहीं लगाई गई.

चंद जवानों के साथ पहुंचे एसएसपी

सोमवार को इस गलती का खामियाजा शहर की पब्लिक ने भुगता. सुबह प्रदर्शनकारी डंडे लेकर बस्तियों से निकले. उन्होंने जबरन बाजार बंद कराने की कोशिश की. लोगों ने पुलिस को फोन किए. तब जाकर पुलिस एक्टिव हुई. फिर भी बाजारों तक पहुंचने में पुलिस को एक घंटा लग गया. तब तक प्रदर्शनकारी बाजारों में दहशत फैला चुके थे. पुलिस बाजारों में पहुंची. वे सड़कों पर आते हुए कलक्ट्रेट पहुंच गए. हजारों की संख्या में भीड़ कलेक्ट्रेट को कूच कर रही थी, तब वहां एसएसपी अमित पाठक, एसपी सिटी कुंवर अनुपम सिंह चंद पुलिसकर्मियों के साथ वहां खड़े थे.

जाम और मारपीट होती रही

धाकरान पर उग्र भीड़ ने पथराव कर दिया. इसके बाद अधिकारियों ने उस ओर दौड़ लगाई. मगर, संख्या को देखकर उन्हें काबू में करना मुश्किल लग रहा था. ऐसे में उन्हें हालात संभालने को फाय¨रग करनी पड़ी. इसके बाद भीड़ एमजी रोड जाम कर खड़ी रही और राहगीरों से मारपीट भी करते रहे. दोपहर बाद जब हालात बेकाबू होते दिखे तब अधिकारियों ने सख्ती दिखाई. इसलिए पुलिस को उन्हें काबू में करने के लिए कई राउंड फाय¨रग और अश्रु गैस के गोले फेंकने पड़े. लेकिन प्रभारी डीएम रविंद्र कुमार मांदड़, एडीजी और आईजी सरीखे कई वरिष्ठ अधिकारी तो अपने एसी ऑफिसों से नहीं निकले.

'गोरिल्ला' नीति अपनाई

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ सड़कों पर उतरे बवाली प्लानिंग से आए थे. अधिकतर युवाओं के हाथों में डंडे थे. जहां मौका मिलता वाहनों में तोड़फोड़ शुरू कर देते. गोरिल्ला अंदाज में सुबह से शाम तक यही क्रम अलग-अलग इलाकों में चलता रहा.