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BAREILLY:

आवाज से तीन गुना तेज उड़ान भरने वाली ब्रह्माोस मिसाइल से लैस सुखोई विमान बरेली से भी उड़ान भरेंगे। वेडनसडे को बंगाल की खाड़ी में सफल टेस्ट फायर के बाद इस कॉम्बिनेशन को लेकर बरेली एयरबेस में भी सरगर्मी तेज हो गई है। बता दें कि बरेली उन चुनिंदा एयरबेस में से है, जहां सुखोई तैनात हैं। जिसमें एक नहीं बल्कि दो स्क्वॉड्रन तैनात किए गए हैं। सनद रहे कि त्रिशूल एयरबेस से सर्विलांस, राहत एवं बचाव कार्य, सैन्य यूनिट्स को लॉजिस्टिक सपोर्ट भी दिया जाता है।

10 मिनट में चटा देंगे धूल

विश्वसनीय सूत्रों के मुताबिक जल्द ही चीन को उसके घर में घुसकर मारने के लिए ब्रह्माोस मिसाइल को एयरबेस में रखने को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं। सुखोई को ऑपरेट करने के लिए एयरबेस को चाक चौबंद किया जा रहा है। इसमें मिसाइल को सुखोई से कनेक्ट करने, फायर टेक्निक्स समेत किन विषम परिस्थितियों में ब्रह्माोस का उपयोग किया जा सकता है समेत कई एक्टीविटीज शुरू हो गई हैं। बताया कि त्रिशूल एयरबेस के अलावा आसाम का तेजपुर एयरबेस भी सुखोई से लैस है। दोनों एयरबेस उत्तरी सीमा से सटे देशों की हवाई गतिविधि पर निगाह रखते हैं।

एलएसी का मेन ऑफिस

त्रिशूल एयरबेस से लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोलिंग एलएसी की निगरानी की जाती है। एयरफोर्स ऑफिसर्स के मुताबिक एयरफोर्स कंट्रोल रूम कभी सोता नहीं। क्योंकि एक झपकी देश के लिए बड़ी मुसीबत बन सकती है। दुश्मन देशों की आसमान के रास्ते हो रही गतिविधियों की मॉनीटरिंग यहीं से होती है। हल्की सी हलचल या कोई हेलीकॉप्टर भारत की सीमा में प्रवेश करता है। तो त्रिशूल एयरबेस में खड़ा सुखाई महज 10 मिनट में हजारों मीटर की ऊंचाई से धूल चटाने में अब सक्षम हो गया है। बेस का यह रूम शौर्य, दृढ़ता, पराक्रम, वीरता, निष्ठा का अतुल्य प्रमाण है।

जूनियर्स भी सीखेंगे तकनीक

पायलट की ट्रेनिंग में काफी ईधन की खपत समेत हेलीकॉप्टर में खराबी, दुर्घटना होने से जानमाल का नुकसान की संभावना रहती है। इससे निपटने के लिए 6 वर्षों से त्रिशूल एयरबेस में फायटर प्लेन सुखोई 'सू-30' को उड़ाने की ट्रेनिंग सिमूलेटर पर दी जा रही है। 3 माह तक ट्रेनिंग कंप्लीट कर चुके जूनियर पायलट को आसमान में पराक्रम दिखाने का मौका मिलता है। अब इस ट्रेनिंग में ऑन डिस्प्ले जूनियर पायलट को ब्रह्माोस को कनेक्ट करने और उसे फायर करने की तकनीकी भी सिखाई जाएगी। ताकि ट्रेंड पायलट जरूरत पड़ने पर दुश्मन को धूल चटा सकें।

एक नजर में .

- 1962 में भारत चीन युद्ध के बाद एयरबेस निर्माण का निर्णय

- 14 अगस्त 1963 को वायु सेना स्टेशन बरेली की स्थापना हुई

- 6 वर्षो से सिमूलेटर पर जूनियर पायलट को दे रहे ट्रेनिंग

- 10 मिनट में चीन बॉर्डर तक पहुंचने में सक्षम है सुखोई

- 1 कंट्रोल रूम के जरिए हो रही देश की सीमा की मॉनीटरिंग

- एयरबेस से उत्तरी सीमा के पहाड़ी क्षेत्रों में की जा रही निगरानी

- थल सेना के यूनिट्स को भी वायु सहायता उपलब्ध कराता है

सक्सेजफुल टेस्ट के बाद त्रिशूल एयरबेस के सुखोई ब्रह्माोस से कनेक्ट किए जा सकते हैं। वार परपज से ब्रह्माोस को इंस्टॉल करने की संभावना है। ब्रह्माोस आने पर एयरबेस की सुरक्षा बढ़ाई जा सकती है।

एके गोयल, रिटायर्ड एयर मार्शल