-1672 में पशु मेले के रूप में शुरू हुआ था नौचंदी मेला

-1857 का संग्राम देखने का गौरव भी नौचंदी से अछूता नहीं रहा

Meerut: पौराणिक मेरठ के इतिहास से जुड़ा है नौचंदी का स्वरूप. मुगलकाल से चले आ रहे नौचंदी मेले में शहर के कई स्वतंत्रता आंदोलनों को महसूस किया. स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष की जहां नौचंदी गवाह बनी. वहीं शहादत के दर्द को भी मेले ने करीब से महसूस किया.

स्वतंत्रता संग्राम का गवाह

अत्याचार और बगावत के सुरों को भी इस नौचंदी ने खूब सुना. यहीं नहीं 1857 का संग्राम देखने का गौरव भी नौचंदी से अछूता नहीं रहा. आजादी की मूरत बनी नौचंदी ने शहर के कई उतार चढ़ाव देखे, लेकिन मेले की रौनक कभी कम न हुई. देश आजाद हुआ तो बंटवारे का वक्त आया. शहर में क्या समूचे देश में सांप्रदायिक माहौल बिगड़ा. अपने जिन सपूतों को मेले में देखकर नौचंदी इतराया करती थी, उनमें खून खराबा देख मां का दिल तार-तार भी हुआ. मगर चाहे शासन मुगलों का रहा हो या अंग्रेजी हुकूमत या फिर स्वतंत्रता संग्राम या सांप्रदायिक दंगे आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि शहर में नौचंदी के मेले का आयोजन न हुआ है.

इंडो-पाक मुशायरा

इंडो-पाक मुशायरा तो इस मेले की जान हुआ करता था. इंडो-पाक मुशायरे में हिंदुस्तान के साथ पड़ोसी मुल्क के शायरों को भी न्यौता दिया जाता था. दिवाकर बताते हैं कि नौचंदी दिन का मेला देहात और रात को शहर का होता था. दिन में दूर-दराज के लोग इस मेले में खरीदारी करने आते थे, जबकि रात होते यहां शहरवासियों का जमावड़ा लग जाता था. इन सालों में नौचंदी के स्वरूप में आई तब्दीली पर दुख जाहिर करते हुए दिवाकर बताते हैं कि अब नौचंदी मेला बस एक औपचारिकता भर रह गया है. अधिकांश लोग रात में वहां जाना पसंद नहीं करते. अब मेले में सुधार की बहुत गुंजाइश है.

संस्कृति की संपूर्ण झलक

देश के कौने-कौने से व्यापारी आकर यहां भिन्न-भिन्न तरीके के उत्पाद बेचते थे. इससे न केवल शहर के लोगों को अपनी कल्चर का बोध होता था, बल्कि देश के आर्थिक लाभ भी होता था. अंग्रेजी हुकूमत के दौरान यहां बहुत बड़ा पशु मेला भी लगता था. इस मेले में अरबी घोड़ों का व्यापार किया जाता था. दिवाकर बताते हैं कि आर्मी अपने घोड़े अधिकांश इस मेले से ही खरीदती थी.

सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक

कहा तो यह भी जाता है कि शहर में जब-जब सांप्रदायिक दंगे हुए तब-तब नौचंदी मेले ने ही हिन्दु-मुस्लिम के दिलों की कड़वाहट दूर की. दंगों के बाद भी दोनों ही पक्ष के लोग नौचंदी मेले में एक साथ देखे गए. शहर में नौचंदी मेला आज 350 साल का हो गया है. सन् 1672 में मेले की नौचंदी मेले की शुरुआत शहर स्थित मां नवचंडी के मंदिर से हुई थी. शुरुआत में इसका नाम नवचंडी मेला था, जो बाद में नौचंदी के नाम से जाना गया. वरिष्ठ लेखक और इतिहास कार धर्मवीर दिवाकर बताते हैं कि नवरात्र के नौवें दिन यहां मेला भरना शुरू हुआ था. धीरे-धीरे मेला बड़ा होता गया और इसका स्वरूप एक दिन से निकल कर दिनों में तब्दील हो गया.

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पुराने समय समय में नौचंदी मेला मेरठ ही नहीं, बल्कि पूरे देश की शान हुआ करता था. मेले में हिन्दू-मुस्लिम की सहभागिता से शहर का सांप्रदायिक सौहार्द बना रहता था.

-धर्म दिवाकर, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी

मेरठ शहर के बारे में जितना कहा जाए उतना ही कम है, मेरठ एक क्रांति की धरा है, सदियों से अपनी सुंदरता को संजोए हुए हैं. लेकिन कुछ लोग इसकी सुंदरता को धुलित करने का प्रयास कर रहे हैं. मेरे हिसाब से अगर हम अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए अपने साथ अपने शहर का भी ख्याल रखे तो इस क्रांतिधरा को और भी खूबसूरत बनाया जा सकता है.

मोन, सदर बाजार, मेरठ