- रोजगार की तलाश में आ रहे शहर

BAREILLY:

बढ़ती आबादी के साथ रोजगार के अवसर भी कम हो रहे हैं. ऐसे में, आबादी का एक बड़ा हिस्सा रोजी-रोटी की तलाश में गांव से शहर की ओर पलायन कर रहा है. खासकर मजदूर तबका, जो शहर तो आ जाते हैं. उनके पास कोई ठौर ठिकाना नहीं होता, खुले में शौच जाना और कहीं भी जगह देखकर झुग्गी-झोपड़ी बना लेते हैं. इस तरह यह एक बड़ी आबादी सिस्टम को कोलैप्स करती है. जैसा कि पिछले दिनों बाकरगंज में देखा गया, जब कूड़े के पहाड़ पर झोपड़ी डालकर आशियाना बनाये सैकड़ों मजदूरों के परिवार बेछत हो गए. गांव से हो रहे पलायन के कारण किस तरह शहर में आबादी का दबाव बढ़ता जा रहा है दैनिक जागरण आईनेक्स्ट के पापुलेशन डे 'आबादी का बम और हम' थीम पर चल रहे अभियान में पढि़ए यह खास रिपोर्ट ..

10 वर्षा में 6 लाख बढ़ी आबादी

यह कहानी सिर्फ रामू की नहीं है. वर्तमान समय में हजारों लोग गांव से पलायन करके शहर में आकर बस गए हैं. पिछले 10 वर्षो में शहर की आबादी काफी तेजी से बढ़ी है. 2011 की जनगणना के मुताबिक शहर की आबादी 9 लाख थी. जो कि बढ़कर लगभग 15 लाख पहुंच गई है. इनमें से हजारों लोग सिर्फ रोजगार की तलाश में गांव से आकर बसे हैं. जो कि किसी तरह खुले आसमान, जर्जर मकान, बस अड्डा, रेलवे स्टेशन आदि जगहों पर किसी तरह गुजर बसर कर रहे हैं. जिन्हें मूलभूत सुविधाएं आज तक नहीं मिली है. पानी, बिजली और खाने के लिए दो वक्त की रोटी के लिए भटकना पड़ता है.

आबादी बढ़ रही मूलभूत सुविधाएं नदारद

शहर की बढ़ती आबादी के कारण स्थिति अर्बन स्लम जैसी हो गई है. शहर में ऐसे कई एरिया है, जो स्लम में आते है. नेकपुर, बिहारीपुर, शांति बिहार, संजय नगर आदि प्रमुख है. जहां पर आज भी सड़क, बिजली, पानी की कमी है. लोगों को रहने के लिए ठीक ढंग से घर तक नहीं है. हालांकि, नगर निगम स्लम एरिया को मॉडल के तौर पर डेवलप करने का प्लान कर चुका है. जहां पर डुप्लेक्स और अपार्टमेंट बनाए जाने का काम होगा. इसके अलावा बिजली, पानी की व्यवस्था भी सुदृढ़ की जाएगी.

पलायन रूके तो बने बात

गांवों में ही उच्च या तकनीकी शिक्षा के संस्थान खोलना, स्थानीय उत्पादों के मद्देनजर ग्रामीण अंचलों में छोटे उद्योगों को बढ़ावा देना, खेती के पारंपरिक बीज खाद और दवाओं को प्रोत्साहित करना, ये कुछ ऐसे उपाय हैं जिनके चलते गांवों से युवाओं के पलायन को रोका जा सकता है. इस राष्ट्रीय समस्या के निदान में पंचायत समितियां अहम भूमिका निभा सकती हैं. पंचायत संस्थाओं में आरक्षित वर्गो की सक्रिय भागीदारी कुछ हद तक सामंती शोषण पर अंकुश लगा सकती. जबकि पानी, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली सरीखी मूलभूत जरूरतों की पूर्ति का जिम्मा स्थानीय प्रशासन को संभालना होगा.

देश में पलायन एक नजर में

भारतीय जनगणना 2011 के अनुसार देश में वर्ष 2011 तक 45.36 करोड़ लोगों ने काम की तलाश में पलायन किया है. इससे में 68 प्रतिशत ऐसे लोग शामिल थे, जिन्होंने काम के लिए गांवों से शहर में पलायन किया.

गांव और शहर की लाइफ स्टाइल अलग होती है. गांव से शहर में पलायन होने से शहर के रिसोर्सेज जल्द खत्म हो जाते हैं. जो कि समस्या पैदा कर सकता है. शहर में आबादी के बढ़ते दबाव को रोकने के लिए सरकार व प्रशासन को गांवों में रोजगार पैदा करने चाहिए.

डॉ. डीके सक्सेना, प्रोफेसर इमेरिटस, बीसीबी

शहर में गांव से पलायन होना अच्छा संकेत नहीं है. भाषा, खाना और रहने की समस्या. शहर में पापुलेशन बढ़ने से प्रदूषण भी काफी बढ़ रहे हैं. जमीन नहीं होने से रहने की समस्या पैदा हो रही है. पलायन को बढ़ने से रोकने के लिए लोगों को अपनी सोच बदलनी होगी.

डॉ. निर्मला जुनेजा, प्रोफेसर इकोनॉमिक्स, बीसीबी