दुनिया के किसी और देश के सामने रोज़गार पैदा करने की समस्या इतनी बड़ी नहीं है. इसके लिए सीधे तौर पर भारत की बड़ी आबादी जिम्मेदार है.

भारत नौजवानों का देश है और अगले कई दशकों तक देश की औसत आयु तीस साल से कम रहने वाली है.

इसलिए देश में कामगार तबका जनसंख्या की तुलना में ज़्यादा तेज़ी से बढ़ रहा है. लेकिन नौकरी और रोज़गार के मौक़े उतनी तेज़ी से नहीं बढ़ रहे.

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हर महीने 10 लाख नौकरियाँ!

भारत में बेरोज़गारी बहुत बड़े स्तर पर नहीं है, लेकिन ज़्यादातर नौजवानों के पास जितना रोज़गार होना चाहिए, उतना नहीं है. उनकी आय उनकी क्षमता से कम है.

अब जो नए रोज़गार तैयार होंगे वो बड़ी कंपनियों या रेलवे या डाक विभाग जैसे बड़े सरकारी विभागों में नहीं होंगे. अब खेती पर भी रोज़गार के लिए निर्भर नहीं हुआ जा सकता.

अब नए रोज़गार के मौके छोटे और मझोले उद्योगों (एसएमई) में बनेंगे. ये एसएमई विनिर्माण, टेक्सटाइल, खाद्य-प्रसंस्करण, गाड़ी-मोटर के कल-पुर्जों का निर्माण, मोबाइल फ़ोन मरम्मत समेत कई अन्य क्षेत्रों में हो सकते हैं.

सेवा क्षेत्र में भी नए रोज़गार तैयार हो सकते हैं. जैसे शहरी इलाक़ों में निजी सुरक्षाकर्मियों की माँग तेज़ी से बढ़ी है. ऐसे ही विभिन्न छोटे उद्योगों और दफ़्तरों में रोज़गार तैयार होंगे. लेकिन हर महीने 10 लाख लोगों को नौकरी देने के लिए आपको हर महीने कम से कम 10 हज़ार नए उद्यम शुरू करने होंगे.

अफ़सरशाही का संकट

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संभव है कि रोज़गार की तलाश की दौड़ में शामिल होने वाले एक चौथाई नवयुवक स्वयं का कामकाज़ शुरू कर दें और उद्यमी बन जाएं. यानी रोज़गार निर्माण का सीधा संबंध नए कारोबार शुरू करने से है. और नए कारोबार का संबंध कारोबार करने से जुड़ी सुविधाओं से हैं.

अगर किसी छोटे कारोबार को शुरू करने के लिए सैकड़ों जगहों से अनुमति और स्वीकृति लेनी होगी, साथ ही अफ़सरशाही से जूझना होगा तो बड़े स्तर पर नए कारोबार शुरू करना संभव नहीं होगा.

हर महीने 10 लाख नौकरियाँ!

भारत की केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को या तो नए कारोबार शुरू करने की राह में आने वाली अड़चनों को दूर करना होगा या फिर नए कारोबार शुरू करने की अनुमति देने की प्रक्रिया में तेज़ी लानी होगी.

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि उनका लक्ष्य कारोबार करने की सहूलियत के मामले में भारत को दुनिया के शीर्ष 50 देशों में ले आना है, अभी वो 142वें स्थान पर है.

कौशल का विकास

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नया कारोबार शुरू करने को आसान बनाने के अलावा रोज़गार तैयार करने की दिशा में तीन अन्य महत्वपूर्ण चुनौतियाँ हैं.

पहली चुनौती है, शिक्षा और कौशल विकास (स्किल डेवलपमेंट). इनके बिना नए रोज़गार निम्न गुणवत्ता के होंगे और उनसे होने वाली आय भी कम होगी. भारत में अकुशल श्रमिकों को इतनी भी मज़दूरी नहीं मिलती कि वो ग़रीबी रेखा से ऊपर उठ सकें.

भारत में एक विचित्र समस्या है रोज़गार में कमी के साथ-साथ कुशल श्रमिकों की कमी. भारत में जिस स्तर पर आधारभूत ढांचा तैयार करने की योजना बनाई जा रही है उसे देखते हुए भारत में ज़रूरत से 80 फ़ीसदी कम सिविल इंजीनियर और आर्किटेक्ट होंगे.

यहाँ तक कि वेल्डर और इलेक्ट्रिशियन जैसे अर्ध-कुशल पेशेवरों की भी कमी रहेगी.

शहरीकरण संबंधी निवेश

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दूसरी चुनौती है, शिक्षा और प्रशिक्षण की उपलब्धतता.

कुशल पेशेवर तैयार करने के लिए भारत को शैक्षणिक संस्थानों और टीचरों के प्रशिक्षण पर भारी निवेश करना होगा. साथ ही शिक्षा कर्ज़ के लिए भी धनराशि उपलब्ध करानी होगी ताकि नौजवान प्रशिक्षण ले सकें. इसका अर्थ है कि भारत में शिक्षा क्षेत्र में बड़े बदलाव की ज़रूरत है.

तीसरी चुनौती है, शहरीकरण और प्रवासन का रोज़गार तथा जीविका से संबंध. भारत का तेज़ी से शहरीकरण हो रहा है. शहरी इलाक़ों में रोज़गार के अवसर ज़्यादा तेज़ी से पैदा हो रहे हैं.

इसलिए शहरी आधारभूत ढांचे में निवेश की सख्त ज़रूरत है, जिसकी पूर्ति वर्तमान सरकार की शहरी नीतियों के अंतर्गत संभव प्रतीत नहीं होती.

शहरों में परिवहन, सस्ते निवास, स्कूल, अस्पताल और मनोरंजन केंद्रों जैसी सुविधाओं का निर्माण करना होगा. ये सही है कि ये ढांचे ज़्यादातर स्वाभाविक रूप से विकसित होते हैं, लेकिन 100 स्मार्ट सिटी जैसे विशेष प्रयासों से इनमें तेज़ी लाई जा सकती है.

चीन का मॉडल

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पिछले तीन दशकों में चीन एक मात्र ऐसा देश है जो इतने बड़े पैमाने पर औद्योगिक रोज़गार निर्माण कर सका है. निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था के सहारे चीन ने बहुत तेज़ी से रोज़गार तैयार किए.

भारत के पास चीन जैसी सहूलियत या राजनीतिक व्यवस्था नहीं है जिससे वो भी ऐसा कर सके.

दुनिया भी एक और निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था को सहयोग देने के लिए तैयार नहीं है. इसलिए भारत में रोज़गार निर्माण मुख्य तौर पर घरेलू कारकों पर निर्भर होगा.

इसके अलावा चीन की श्रम आपूर्ति में आई स्थिरता का लाभ भी भारत उठा सकता है. बढ़ती मज़दूरी और मज़दूरों की कमी के कारण बहुत से कम लागत वाले निर्माण कार्य चीन से बाहर जा रहे हैं. भारत चाहे तो इस मौक़े का लाभ उठा सकता है.

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