- लाश की दुर्दशा होती रही और सरकारी सिस्टम मूक दर्शक बना रहा

BAREILLY:

किसी शव के साथ सरकारी महकमा किस तरह बदसलूकी करता है. इसका नजारा पोस्टमार्टम हाउस पर ट्यूजडे देखने को मिला, जब आंधी में हुए हादसे का शिकार बने लोगों के शवों को पोस्टमार्टम हाउस तक पहुंचाने के लिए एंबुलेंस नहीं मिली, तो पोस्टमार्टम हाउस पर शवों को डंडों पर टांगकर ले जाया गया, जिसे देखकर मानवीयता भी शर्मशार हो जाए, लेकिन अधिकारियों की आंखों का पानी नहीं मरा.

नहीं मिली एम्बुलेंस व स्ट्रेचर

सरकारी सुविधा के नाम पर शव को पोस्टमार्टम लाने और उठाने के लिए पीडि़त परिवार को एम्बुलेंस और स्ट्रेचर तक नसीब नहीं हुए. हादसे में मारे गए सुभाषनगर के 24 वर्षीय राहुल उर्फ सोनू के शव की कुछ ऐसी दुर्दशा हुई. राहुल के पिता मुन्ना जब सरकारी शव वाहन मांगने गए तो जिला अस्पताल में मना कर दिया गया. मुन्ना के जेब में इतने रुपए नहीं थे कि प्राइवेट वाहन कर सके. लिहाजा, परिचितों से 800 रुपए इकट्ठा कर प्राइवेट वाहन से बेटे का शव पोस्टमार्टम हाउस लेकर आए. प्रशासन की बेरुखी के शिकार परिजनों का कलेजा तब फट पड़ा, जब पोस्टमार्टम हाउस के कर्मचारी उनके बेटे राहुल का शव स्ट्रेचर पर ले जाने की बजाय दो डंडों पर इस तरह लटका लिये कि शव दो तरफ लटक गया. शव की इस बेकद्री पर परिजन कुछ बोल भी न सके.

ठेले पर लाना पड़ा भाई का शव

वहीं आंधी की चपेट में आए लक्ष्मण की प्राइवेट अस्पताल में मौत हो गई, लेकिन उसके शव को भी पोस्टमार्टम हाउस तक पहुंचाने के लिए जिला अस्पताल से एम्बुलेंस या शव वाहन नहीं मिल सका. जिसके चलते भाई वीर सिंह को सात सौ रुपए में ठेला तय करना पड़ा, जिस पर शव रखकर पोस्टमार्टम हाउस ले गए. वीर के भाई के शव को भी पोस्टमार्टम हाउस स्टाफ दो डंडों पर टांग ले गया.