केस -1

एनई रेलवे के भटनी स्टेशन पर तैनात गैंगमैन रामरूप 40 साल तक रेलवे से जुड़े रहे। पसीना बहाया और अपनी सारी जिंदगी रेलवे की सेवा में गुजार दी। मगर जब 2017 में वह रिटायर हुए तो रेलवे ने उन्हें अपना मानने से इनकार कर दिया। रेलवे का कहना है कि उनका स्क्रीनिंग टेस्ट नहीं हुआ है। इस जरा सी चूक से अब रामरूप पेंशन और दूसरे पेमेंट के लिए कार्मिक विभाग का चक्कर लगा रहे हैं।

केस 2

एनई रेलवे हेडक्वार्टर में तैनात अरुण झा टीएमसी विभाग में तैनात हैं। ग्रेड वन में प्रमोशन के वक्त रेलवे एडमिनिस्ट्रेशन ने रोक लगा दी। एडमिनिस्ट्रेशन के जिम्मेदारों का कहना है कि इनका प्रमोशन इसलिए नहीं किया जा सकता क्योंकि इनकी छानबीन परीक्षा नहीं हुई है। बार-बार परीक्षा के लिए बुलाए जाने पर अरुण न्यायालय की शरण में गए हैं। कोर्ट ने अरुण को प्रमोट करने का आदेश दिया है।

GORAKHPUR: यह दो मामले तो एग्जामपल भर हैं। रेलवे में ऐसे दर्जनों केस हैं, जो महज लापरवाही के पेंच में प्रमोशन और अपनी जिंदगी भर की गाढ़ी कमाई पाने से दूर हैं। भले ही इंडियन रेलवे का नाम देश नहीं दुनिया में हो, लेकिन छोटी लापरवाहियों की वजह से इनकी इमेज बिगड़ रही है। मगर जिम्मेदार बजाए अपनी गलती को दुरुस्त करने के इन सब चीजों से किनारा कर रहे हैं। जिसकी वजह से लोगों को कोर्ट का सहारा लेना पड़ रहा है।

अफसर को मान रहा गेटकीपर

सरकारी महकमा हो या फिर प्राइवेट, वक्त बीतने के साथ ही उसके कद और पद में इजाफा होता ही है। यह यूनिवर्सल रूल है। इसमें प्रमोशन के साथ ही एंप्लॉई की सैलरी भी बढ़ती है। लेकिन रेलवे में इसका बिल्कुल उलट हो रहा है। यहां जिंदगी भर सेवा देने वाले एंप्लाई को बजाए प्रमोट करने के रेलवे डिमोट कर रहा है। स्क्रीनिंग टेस्ट से जुड़े सभी मामलों में दर्जनों रिटायर्ड रेलकर्मियों की जिंदगी भर की मेहनत और गाढ़ी कमाई फंसी हुई है। इन रेलवे एंप्लॉई में कुछ ऐसे हैं, जो थकहार कर बैठ चुके हैं, तो वहीं कुछ अब विभाग का चक्कर लगा रहे हैं। राजेंद्र प्रसाद इसका जीता-जागता एग्जामपल हैं। जो स्टेशन अधीक्षक पोस्ट से रिटायर्ड हुए, लेकिन विभाग उन्हें गेटकीपर मान रहा है। राजेंद्र प्रसाद वर्ष 2013 में उनौला से स्टेशन अधीक्षक पद से रिटायर हुए। रिटायरमेंट के समय इनका ग्रेड पे 4800 था। रेलवे प्रशासन ने अब उन्हें गेटकीपर बना दिया है। इनका ग्रेड पे संशोधित कर 1900 हो गया है। गोरखपुर में तैनात राम किशुन पांडेय का प्रमोशन भी रेलवे के स्क्रीनिंग टेस्ट से ही फंसा हुआ है। वह भी कोर्ट गए तो उन्हें न्याय मिला।

बॉक्स

120 दिन के बाद होता है टेस्ट

जोनल व मंडल स्तर पर अस्थाई रूप से नियुक्त किए गए फोर्थ क्लास एंप्लाई का 120 दिन के बाद अनिवार्य रूप से स्क्रीनिंग टेस्ट कराया जाता है। इसके बाद रेलकर्मी को परमनेंट पोस्टिंग दी जाती है। स्क्रीनिंग टेस्ट से पहले रेलकर्मी अस्थाई रूप से तैनात होते हैं।

वर्जन

स्क्रीनिंग टेस्ट को लेकर जरूरी कार्यवाही की जा रही है। रेलकर्मी को उचित स्तर पर अप्लीकेशन देनी चाहिए। उसके अनुरूप आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। संजय यादव, सीपीआरओ, एनई रेलवे