जब मैं छोटा था, तब मेरे पिता जी ने एक बार मुझसे कहा कि चलो तुम्हें आज एक नेता को दिखाता हूं। वह मुझे मोपेड पर बैठाकर लक्ष्मण मेला मैदान ले गए। वहां अटल जी की रैली होने वाली थी। तब ठंड बहुत थी। वहीं कंबल ओढ़े तीन चार लोग मिले, जोकि कम्युनिस्ट पार्टी से थे। पिता जी ने उनसे पूछा आप लोग यहां पर? तब उनका जवाब था- हम ही नहीं कई और लोग भी आए हैं, अटल जी को सुनने के लिए। तब पहली बार मैंने अटल जी को भाषण देते देखा था।

लखनऊ मेयर के चुनाव में अटल जी ने इस अंदाज में किया था मेरा चुनाव प्रचार
साल 2006 में जब मैं मेयर के चुनाव में खड़ा हुआ, उस समय अटल जी लखनऊ के सांसद थे। वह मेरे प्रचार के लिए निकल पड़े। जनता से मेरा परिचय उन्होंने यह कहते हुए कराया था कि मित्रों, इस बार मैं आपके बीच में एक नौजवान को लेकर आया हूं। ये यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर हैं, शिक्षित हैं, संस्कारी हैं। 2006 में लखनऊ के कपूरथला में हुई वह जनसभा अटलजी की लखनऊ में आखिरी जनसभा थी। उसके बाद उन्होंने लखनऊ में कोई जनसभा नहीं की। जब वे जनसभा में शामिल होने आए थे, तब उन्हें तेज बुखार की पीड़ा थी, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने सभा को टाला नहीं था। यह काम के प्रति उनका समर्पण ही था। चूंकि मुझे मेयर पद के लिए नामित किया गया था इसलिए उन्होंने मुझे मंच पर खड़ा कर दिया, और बोले- 'बोलो-बोलो। फिर मेरे बोलने के बाद अटलजी खड़े हुए। उन्होंने कहा, 'आप लोग नारा लगाते हैं, आपका नेता कैसा हो... अटल बिहारी जैसा हो, तो भीड़ ने कहा 'हां' । इसके बाद अटलजी ने कहा, 'मैं अपने आपको इसमें देखता हूं। आप ही बताइए अगर मैं कुर्ता पहना हूं और पायजामा न पहनूं तो? इस पर कार्यकर्ताओं ने कहा कि अच्‍छा नहीं लगेगा। फिर अटलजी ने कहा कि दिनेश शर्मा मेरे पायजामा हैं और नगर निगम के मेयर के रूप में मुझे चाहिए। सांसद बनाकर आप लोगों ने मुझे कुर्ता तो पहना दिया, अब पायजामा नगर निगम का है। इसे मेयर बनाकर पायजामा भी पहना दो।

जब दिनेश शर्मा के चुनाव प्रचार में अटलजी ने कहा था इन्‍हें जिताकर मुझे पायजामा पहना दो

अपने आप में विराट व्यक्तित्व थे 'अटल बिहारी'
उनके द्वारा कहा गया एक-एक शब्द पूरी चर्चा का विषय बन जाता था। उसके बाद तो मैं जहां भी प्रचार के लिए गया, लोगों ने कहा अटलजी को कुर्ता तो दे दिया है, अब पायजामा भी देंगे। जाओ निश्चिंत रहो। जहां एक तरफ चुनाव में पैसे चल रहे थे और बाहुबल का इस्‍तेमाल हो रहा था, वहीं दूसरी ओर मैं बस अटलजी के एक वाक्य से चुनाव जीत गया। इसके बाद मैं उनसे मिलने दिल्ली गया। उस वक्त मदनलाल खुरानाजी, साहेब सिंह वर्माजी, कोहली जी और कुछ अन्य लोग किसी विषय पर वहां विचार-विमर्श कर रहे थे। मेरे पहुंचते ही अटल जी ने मुझे गले से लगाया। मथुरा का पेड़ा उन्हें कोई दे गया था। अपने हाथ से उन्होंने मुझे पेड़ा खिलाया और आशीर्वाद दिया। वह पल मेरे लिए सुख का ऐसा अनुभव था, जिसका विश्लेषण नहीं किया जा सकता। राजनीति में वे मेरे आदर्श हैं। अपने आपमें वे विराट व्यक्तित्व थे। उनकी तुलना विश्व में किसी से भी नहीं की जा सकती। लखनऊ में तो कार्यकर्ताओं के बीच होड़ लगती थी, यह जानने के लिए कि अटलजी का खास कौन है। वे छोटे से छोटे कार्यकर्ता को भी नाम से बुला लेते थे। हरकिशन सिंह सुरजीत कम्युनिस्ट पार्टी के नेता थे। जब वे एक बार लखनऊ पहुंचे तो अटलजी ने उन्हें गले लगाते हुए कहा, 'कैसे हो सुरजीत। यह देखकर सभी कार्यकर्ता चौंक गए थे। विपक्षी भी उन्हें बहुत मानते थे। कुछ ऐसा था उनके व्यक्तित्व का प्रभाव। पहले भी दिल्ली में एक मुलाकात के दौरान उन्होंने मुझसे कहा था कि एक युवा आयोग बनना चाहिए और जब वो प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने आयोग बनाया और उसमें मुझे रखा। फिर हम लोगों ने युवा नीति बनाई, जिस पर आगे चलकर काम भी हुआ।

जब दिनेश शर्मा के चुनाव प्रचार में अटलजी ने कहा था इन्‍हें जिताकर मुझे पायजामा पहना दो

उनके मन में किसी के प्रति विरोध नहीं था
मुझे याद है कि बहुत पहले जनसंघ की एक बैठक हुई थी, हमारे छोटे से घर पर। वे तमाम बड़े नेताओं के साथ में आए। दरअसल, पहले भाजपा के नेता एक दिन कार्यकर्ताओं के यहां प्रवास किया करते थे। यह परंपरा अभी भी चल रही है। एक बार वे पंडित दीन दयाल जी के साथ हमारे घर पर रुके थे। तब हमारा घर बहुत छोटा सा हुआ करता था। ऐसे ही एक बार अटल जी मेरे घर पर खाना खाने आए। पिताजी के साथ उन्होंने भोजन किया। भोजन के बाद उनका मन खीर खाने का हुआ। उस समय खीर नहीं बनी थी, तब पिता जी ने तत्काल खीर बनवाकर उन्हें खिलाया। लखनऊ का तो हर व्यक्ति उनको अपने निकट समझता है। उनके मन में सबके प्रति प्रेम था। विरोध किसी के प्रति नहीं था। शायद इसीलिए अटल जी महज एक नाम नहीं, बल्कि एक विचारधारा हैं। यह अटल जी की जो धाक है, यह अटल विचारधारा, इसे बरसों तक लोग मानेंगे। मेरे जैसे कई नेता जिन्होंने अटल जी के साथ समय बिताया, उनके मार्गदर्शन में काम किया, वे सब इस विचारधारा से प्रेरित हैं और इसका अनुसरण करते आए हैं। वे हृदय को स्‍पर्श करने वाले स्‍वामी हैं। अप्रिय शब्दों को भी मधुर ढंग से कहना उनकी अनूठी शैली रही। वह सामने वाले को गलती का अहसास ऐसे कराते थे कि उसे बुरा भी न लगे और उनकी बात भी पूरी हो जाए। गांव-गांव व घर-घर जाकर लोगों से वोट मांगना, उनके कार्यशैली का हिस्सा था। वे अपने संसदीय क्षेत्र को अपना घर मानते थे। रात में प्रचार करते वक्त जिस गांव में रात हो जाती, अटल जी वहीं ठहर जाते और सुबह होते ही वहीं से फिर चुनाव प्रचार के लिए निकल पड़ते।

मेरी बात सुनकर चमक उठी थीं उनकी आंखें
मैं कुछ दिन पहले अटलजी को देखने दिल्‍ली गया था। अटलजी के परिजन वहां मौजूद थे। उन्होंने कहा कि जाओ कुछ बोलो शायद वे कुछ कहें। उनके पास बैठकर मैंने उनके कान में कहा, 'बापजी, मैं डॉक्टर आपका मेयर आया हूं। यह सुनकर उनकी आंखें चमक उठीं। उन्होंने पूछा कैसे हो। उनकी आवाज ने मुझे बेहद भावुक कर दिया और मैं कुछ बोल नहीं पाया। यकीनन वह क्षण बेहद भावुक था, मेरे लिए। आज जब वे हमारे बीच में नहीं हैं, तो मेरे अंतर्मन में असीम वेदना है।

लेखक : डॉ. दिनेश शर्मा, डिप्‍टी सीएम, उत्‍तर प्रदेश (In conversation with Pankaj Awasthi)

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