-देवगुरु बृहस्पति का वृश्चिक राशि में प्रवेश, सायं 7:20 बजे

-गुरु की अनुकूलता के लिए गुरुवार का व्रत गुरु कारक वस्तुओं का करना चाहिए दान

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BAREILLY : देव गुरु वृहस्पति 11 अक्टूबर 2018 को अपनी शत्रु राशि 'तुला' से निकलकर मित्र राशि 'वृश्चिक' में सायं 7:20 बजे प्रवेश करेंगे. यहां यह पांच नवम्बर 2019 तक रहेंगे. गुरु का वृश्चिक राशि में प्रवेश मेष, मिथुन, कन्या, एवं धनु राशि वालों के लिए विपरीत फल कारक रहेगा. वहीं कर्क, तुला, मकर, कुंभ एवं मीन राशि वालों के लिए शुभ फलकारी रहेगा. जबकि अन्य राशि वालों के लिए सामान्य फलकारी रहेगा. बालाजी ज्योतिष संस्थान के ज्योतिषाचार्य पं. राजीव शर्मा ने बताया कि जिन राशि वालों के लिए गुरु विपरीत फलकारी हो उन्हें गुरु की अनुकूलता के लिए गुरुवार का व्रत, गुरु की कारक वस्तुओं का दान, स्वर्ण अथवा पीतल का रिंग धारण करना, गुरु मंत्र का जाप करना आदि के गुरु के नकारात्मक फलों को कम करेगा.

मेष राशि:- ज्योतिष ग्रन्थों के अनुसार जन्म राशि से अष्टम भाव में गुरु का गोचर सभी क्षेत्रों में प्रतिकूल फल दायक रहता है. स्वास्थ्य एवं पारिवारिक समस्याओं में वृद्धि हो सकती है. नौकरी एवं व्यवसाय से सम्बन्धित समस्याएं भी उत्पन्न हो सकती है. अष्टम भाव का प्रतिवेध स्थान सप्तम भाव है. जब तुला राशि में अन्य ग्रहों का गोचर होगा, तब गुरु के अशुभ फलाें में कमी का अनुभव होगा. चूंकि वृश्चिक राशि गुरु की मित्र राशि है, इसलिए इस राशि में गुरु के भाग्येश का अष्टम भाव में गोचर करना शुभ फलदायक नहीं होता.

वृष राशि:- गुरु का सप्तमस्थ गोचर प्राय: सभी क्षेत्रों में अनुकूल फलदायक रहना चाहिए. इस गोचरावधि में शुभ समाचाराें की प्राप्ति होगी. कार्यो में चल रहे अवरोध दूर होगें. मन प्रसन्न एवं प्रफुल्लित रहेगा. उत्साह एवं सकारात्मकता का संचार होगा और नकारात्मक विचार दूर होंगे. आलस्य एवं कार्यों को टालने की प्रवृत्ति दूर होगी. जब कर्क रािश में अन्य ग्रहों का गोचर हो गए तब-तब गुरु के शुभ गोचर फलों में कमी का अनुभव होगा. गुरु के सप्तमस्थ गोचर के फलस्वरूप शनि की अष्टम ढैया के अशुभ फलों में भी कमी आएगी.

मिथुन राशि:- ज्योति शास्त्र के अनुसार गुरु का षष्ठ भाव में गोचर शुभफलदायक नही होता. इसके फलस्वरूप कार्यो में बाधाएं, शत्रुजनित समस्याएं, मित्राें एवं परिजनों से वाद-विवाद और असहयेाग, स्वास्थ्य संबंधी प्रतिकूलता का सामना करना पड़ सकता है. षष्ठ भावास्थय गुरु का प्रतिवेध स्थान षष्ठ ही है. इसलिए वृश्चिक राशि में जब-जब अन्य किसी ग्रह का गोचर होगा, तब-तब गुरु के अशुभफलों में कमी आएगी.

कर्क राशि:- जन्मराशि से पंचम भाव में गुरु का गोचर सामान्यत: प्रसन्नता, सकारात्मकता, उत्साह, नवोन्वेष, उद्यमशीलता जैसे सद्गुणों में वृद्धि होती है. पंचम का वेध स्थान चतुर्थ है इस प्रकार जब-जब तुला राशि में अन्य ग्रहों का गोचर रहेगा तब-तब व्यक्ति को गुरु के शुभफलाें में कमी का अनुभव होगा. इस गोचरावधि में शनि का षष्ठ भाव में गोचर रहेगा. जो कि शुभफलदायक है.

सिंह राशि:- बृहस्पति का जन्मराशि में चतुर्थ भाव गोचर जहां एक ओर विवाह एवं कॅरियर की दृष्टि से अनुकूल फलप्रद होता है. वही दूसरी ओर स्वास्थ्य, सम्पत्ति एवं पारिवारिक सुख की दृष्टि से परेशानी होगी. चतुर्थ भाव का प्रतिवेध स्थान पंचम भाव है जिसमें शनि को गोचर रहेगा. इस प्रकार गुरु के अशुभ गोचरफल में कमी का अनुभव हो सकता है.

कन्या राशि:- जन्म से तृतीय भाव में गुरु का गोचर सर्वाधिक अशुभफलप्रद माना जाता है. यह सभी क्षेत्रों में अशुभफल प्रदान करता है, इसका प्रतिवेद स्थान द्वितीय भाव है. इस प्रकार तुला राशि में जब-जब नया ग्रहाें का गोचर होगा. तब-तब गुरु के अशुभ फलों में कमी का अनुभव भी होगा.

तुला राशि:- जन्मराशि से द्वितीय भाव में गुरु का गोचर शुभफलदायक होता है. सभी क्षेत्रों में शुभफल प्राप्त होते हैं रुके हुए कार्यों में प्रगति होगी. उत्साह एवं पराक्रम बढ़-चढ़ा रहेगा. आत्मविश्वास एवं पहल करने की क्षमता में वृद्धि होगी. इस गोचरावधि के दौरान शनि का गोचर तृतीय भाव में रहेगा. फलत: शनि के शुभफलों में भी वृद्धि होगी. द्वितीय भाव में गुरु के गोचर को वेध स्थान द्वादश भाव है इस प्रकार कन्या राशि में जब-जब अन्य ग्रहों को गोचर होगा, तब-तब गुरु के शुभफलाें में कमी का अनुभव होगा.

वृश्चिक राशि:- ज्योतिषीय ग्रन्थों के अनुसार जन्मराशि के ऊपर से गुरु का गोचर सामान्यत: शुभफलदायक नहीं होता. लेकिन व्यवहार में यह कुछ क्षेत्रों में शुभफलदायक, तो कुछ क्षेत्रों में अशुभ फलदायक होता है. जन्मराशि अथवा जन्मकालिक गुरु के ऊपर से गुरु का गोचर जीवन में महत्वपूर्ण परिवर्तन लेकर आता है. ये परिवर्तन शुभ भी हो सकते हैं और अशुभ भी वही दूसरी ओर वह जातक के स्वाभाव में सकारात्मक दृष्टिकोण उत्पन्न करता है.

धनु राशि:- जन्मराशि से द्वादश भाव में गुरु का गोचर सामान्यत: शुभ फलदायक नहीं होता. यह आकस्मिक समस्याएं उत्पन्न करने वाला होता है. विभिन्न क्षेत्रों में अवरोध आकस्मिक समस्याओं से प्रगति बाधित होती है. द्वादश भाव का प्रतिवेध स्थान एकदश भाव है. इस प्रकार तुला राशि में जब-जब अन्य ग्रहों का गोचर हो गए तब-तब गुरु के अशुभ फलों में कमी का अनुभव होगा. गोचरावधि के दौरान शनि का गोचर भी अशुभ फलदायक है. शनि जन्मराशि के ऊपर से गोचरत रहेगा. जो कि मध्य की साढे़साती का प्रभाव देगा. फलत: गुरु के अशुभफलाें में वृद्धि का अनुभव होगा.

मकर राशि:- जन्मराशि से एकादश में भाव में गुरु को गोचर प्राय: सभी क्षेत्रों में शुभफलदायक रहता है. इस गोचरावधि में अवरूद्ध कार्यो में प्रगति होगी तथा उनमे सफलता प्राप्ति के अवसरों में वृद्धि होगी परिजनों एवं मित्रों का अपोक्षित सहयोग प्राप्त होगा. वहीं भाग्य का भी पर्याप्त सहारा मिलेगा. इस गोचर अवधि में पराक्रम में वृद्धि इत्यादि शुभ फल भी प्राप्त होंगे. एकादश भाव का वेध स्थान अष्टम भाव है. गुरु का इस गोचरावधि के दौरान शनि का गोचर द्वादश भाव में रहेगा. जो कि साढे़साती के प्रभाव देने वाला रहेगा. गुरु के शुभ गोचर के प्रभाव से शनि की साढेसाती के अशुभ प्रभावों में भी कमी आएगी.

कुम्भ राशि:- जन्मराशि से दशम भाव में गुरु के गोचर को प्राय: ग्रन्थों में अशुभफलदायक बताया गया है. इसके फलस्वरूप नौकरी एवं व्यवसाय में अवरोध, सम्पत्ति सम्बन्धी विवाद, माता-पिता के सुख में कमी गृहक्लेश की अधिकता, रूग्णता इत्यादि फल प्राप्त होते है. दशम भाव का प्रतिवेध स्थान नवम भाव हैं इस प्रकार जब-जब तुला राशि में अन्य ग्रहों का गोचर होगा तब-तब गुरु के अशुभ फलों में कमी आएगी. कुम्भ राशि वाले व्यक्तियों के लिए गुरु की इस गोचरावधिक के दौरान शनि एकादश भाव में गोचर करेगा. जो कि शुभफलदायक है.

मीन:- मीन राशि वाले जातकों के लिए गुरु का गोचर प्राय: सभी क्षेत्रों में शुभ फलदायक कहा जा सकता है. रुके हुए कार्यों में प्रगति होगी तथा अपेक्षित सफलता भी प्राप्त होगी. उत्साह में वृद्धि होगी तथा विचार सकारात्मक बनेंगे. भाग्य का अपेक्षित सहयोग प्राप्त होगा एवं कार्य में प्रगति होगी. स्वभाव में परिवर्तन होगा. शान्ति एवं विनम्रता का प्रभाव बढे़गा. नवम भाव में गोचर का वेध स्थान दशम भाव है जिसमें शनि का गोचर हो रहा है. इस प्रकार गुरु के नवम भाव में गोचर के जो शुभफल हैं उनमें कमी का अनुभव होगा.