निधि ने ब्लड कैंसर से नहीं मानी हार, बच्चे चिढ़ाते थे लेकिन उसने इसे मोटिवेशन की तरह लिया

महक ने छोटी उम्र में अपनों को खोने का गम सहा लेकिन जज्बे को टूटने नहीं दिया

MEERUT। तमाम सुविधा, संसाधन और खुशियों के आगोश में रहकर जीतना आसान है। मगर जब दर्द और दुखों का पहाड़ जिंदगी के आड़े आने लगे तब जज्बे की ताकत से दर्द को दवा बनाकर मंजिल का रास्ता तलाशना के मायने ही और होते हैं। सीबीएसई की बोर्ड के 12वीं के रिजल्ट में कुछ ऐसा ही कर दिखाया मेरठ पब्लिक स्कूल फॉर ग‌र्ल्स वेस्ट एंड रोड में पढ़ने वाली निधि और महक ने।

कभी हार नहीं मानी

मेरठ पब्लिक स्कूल फॉर ग‌र्ल्स में 12वीं की स्टूडेंट निधि आर्या ब्लड कैंसर सरवाइवर है। निधि ने 12वीं बोर्ड में 84 प्रतिशत अंक लाकर साबित कर दिया की वह जाबांजी और हिम्मत बटोर कर विजेता बनी है। बकौल निधि क्लास 7 में पहली बार मुझे अपनी बीमारी के बारे में पता चला। 4 साल कीमोथेरेपी हुई लेकिन डर कभी नहीं लगा। हालांकि इलाज के दौरान हेयर शेड हुए और वजन बढ़ गया तब उसकी हालत देखकर साथ के बच्चे उसे चिढ़ाते थे। मगर यहां भी उसने हार नहीं मानी और पॉजिटिव सोच के साथ आगे बढ़ती गई। वह बताती है इस बीच एक पल के लिए भी उसने जिंदगी से हारने के बारे में नहीं सोचा। हर वक्त दिमाग में यही बात रही कि कुछ नहीं होता सब ठीक हो जाएगा। निधि के पिता मनीष कंकरखेड़ा में ग्रोसरी शॉप चलाते हैं जबकि मदर चंचल उनको हेल्प करती हैं। वह कहती हैं कि पेरेंट्स की वजह से ही वह इस पड़ाव को इतनी सहजता से पार कर पाई है।

'मिलावट को मिटाना है'

निधि फूड एंड ड्रग डिपार्टमेंट में जाना चाहती हैं। वह कहती है कि मिलावटी फूड आइटम की वजह से उसको ब्लड कैंसर से जूझना पड़ा। अब वह आगे बढ़कर इसे रोकने का प्रयास करेगी। इसके लिए पहले बीएससी एग्रीकल्चर से ग्रेजुएशन करेगी। निधि कहती है कि देश में मिलावट बहुत बड़ा इश्यू है और उसका मोटिव मिलावट को जड़ से खत्म करना है।

खुद को टूटने नहीं दिया

एमपीजीएस की ही 12वीं क्लास की महक दास्तां भी कुछ कम नहीं है। बोर्ड एग्जाम से कुछ वक्त पहले पिता और एग्जाम के बीच में ही दादी को खो देने वाली महक एक बार को तो अंदर से टूटने लगी थी। मगर जिम्मेदारी के अहसास से साहस और हिम्मत जुटाकर मन को मजबूत किया। महक के इसी जज्बे ने उन्हें 12वीं के रिजल्ट में सफलता की दलीज पर ला खड़ा किया। वेस्ट एंड रोड स्थित एमपीजीएस की ही स्टूडेंट महक ने बताया कि पापा के जाने के बाद घर में मम्मी नम्रता जैन और दादी को देखकर वह आगे बढ़ रही थी। घर में सबसे बड़ी होने के नाते जिम्मेदारियां भी थी लेकिन परेशानियां बताकर नहीं आती। बोर्ड एग्जाम चल रहे थे और दादी मां की डेथ हो गई। गम के माहौल में पढ़ना तो दूर रहना भी मुश्किल हो गया था। कभी मां को संभालती को कभी छोटे भाई को। महक कहती है कि जिंदगी रूकने का नाम नहीं है। ऐसे में उसने भी हार नहीं मानी। विपरित परिस्थितियों में भी 80 प्रतिशत अंक हासिल किए। महक नोएडा के किसी अच्छे कॉलेज से बीबीए करना चाहती है।