- डीएम ने दिया बताकर जांच करने का आदेश

- पेरेंट्स ने पूछा, आखिरकार ये कैसी जांच है

MEERUT : पब्लिक स्कूल की जांच के नाम पर तो खूब ड्रामेबाजी हुई. कभी स्टूडेंट्स ने स्कूलों की शिकायत की तो कभी स्कूलों ने जांच टीम पर आरोप लगाया. अब ताजा घटनाक्रम में डीएम ने जांच टीम को कहा है कि वो जांच के लिए जाने से पहले स्कूल्स को इनफॉर्म करें. आखिर अब तक के जांच से क्या कोई सॉल्यूशन निकला और क्या ऐसे जांच से कोई क्या कोई सॉल्यूशन निकल पाएगा. अगर जांच के पहले स्कूल्स को बता ही दिया जाएगा तो जांच कितना जांच रह जाएगा.

आखिर कहां गए पेरेंट्स

कोई भी जांच किसी शिकायत के आधार पर की जाती है. पब्लिक स्कूलों की जांच भी पेरेंट्स की शिकायत के आधार पर ही हुई थी. अगर जांच समिति, जांच की बैठक और जांच के परिणामों से शिकायतकर्ता को ही दूर रखा गया है, तो आखिरकार ये जांच किसके लिए हुई है. पेरेंट्स भी यही मान रहे है कि यह जांच उनके किसी काम की नहीं है. सदर निवासी आरती सोनकर कहती हैं कि जब जांच टीम ने पेरेंट्स से उनकी शिकायत नहीं पूछी, पेरेंट्स को उनकी समस्याओं का हल नहीं बताया तो फिर किस बात की जांच. बेगमबाग निवासी नमिता अग्रवाल का कहना है कि पेपर में पढ़ने के बाद ही कुछ सच्चाई सामने आती है, वरना तो हमें यह भी नहीं पता लग पाता किसी स्कूल में टीम गई भी है या नहीं.

अपने आरोपों से हटे पीछे

पब्लिक स्कूल जांच टीम पर लगाए आरोपों से खुद ही पीछे हट रहे हैं. जांच टीम पर अभद्र भाषा और गलत व्यवहार का आरोप लगाने वाले पब्लिक स्कूल अब अपनी बात को तोड़ मरोड़कर पेश करने की बात कर रहे हैं. एमपीएस मेन विंग की प्रिंसीपल अनिता त्रिपाठी का कहना है कि टीम को स्कूलों में बिना जानकारी के नहीं पहुंचना चाहिए. वहीं शांति निकेतन विद्यापीठ के प्रिंसीपल कृपाल सिंह का कहना कि टीम ने अभद्र व्यवहार किया या नहीं इस बारे में कुछ बोलना ठीक नहीं है. जीटीबी के प्रिंसीपल कपिल सूद कहते हैं कि टीमों को जांच से पहले थोड़ा जानकारी देनी चाहिए. टीमों ने स्कूल से किस तरह का गलत व्यवहार किया है इस बात का तो स्कूलों को खुद भी नहीं पता है.

प्रशासन कर रहा फेवर

बचत भवन में डीएम की मीटिंग से साफ हो गया है कि प्रशासन खुद ही पब्लिक स्कूलों का फेवर करने में है. पहले तो बड़े और शिकायती स्कूलों की जिम्मेदारी बड़े अधिकारियों को सौंपी गई, जहां केवल बस खानापूर्ति की जांच चली. दूसरी बात बैठक में भी डीएम ने जांच टीमों को सीधे निर्देश दिया है कि टीम जाने से पहले ही स्कूलों को सूचना देकर जांच करने जाएं. पेरेंट्स भी यही मान रहे हैं जब स्कूलों की जांच करने से पहले ही सूचना देनी है, तो फिर नाम के लिए जांच करने से क्या फायदा है.

नियमों से परे है स्कूल

पब्लिक स्कूलों के लिए सेंट्रल बोर्ड द्वारा बनाए गए नियमों पर जाएं तो अधिकतर स्कूल इससे परे हैं. नियमानुसार तो एक स्कूल में एक सेक्शन में केवल ब्0 बच्चे होने चाहिए, स्कूलों में एक क्लास में ज्यादा से ज्यादा बस चार सेक्शन होने चाहिए, जबकि अधिकतर पब्लिक स्कूलों में पांच से छह सेक्शन हैं. बच्चों की संख्या में भी नियमानुसार नहीं है.

जांच को दूर क्यों रखा गया

पब्लिक स्कूलों से तो पेरेंट्स को शिकायत है, तो फिर हम पेरेंट्स को जांच को दूर क्यों रखा गया है. कहीं सेटिंग गेटिंग का चक्कर तो नहीं है.

ज्ञानचंद, रजबन निवासी

इस तरह से तो जांच कोई फायदा नहीं है, क्योंकि पेरेंट्स को तो इससे कोई फायदा नहीं होने वाला है, जेब तो फिर भी स्कूलों की भरनी है.

आंचल, बेगम बाग निवासी

अगर स्कूलों को बताकर ही जाना है तो फिर जांच कौन सी हुई, और ये जांच तो पेरेंट्स के लिए हो रहीं है, तो फिर पेरेंट्स को किसी ने क्यों नहीं पूछा.

शांति, मोहनपुरी निवासी