-शहर में बढ़ गया कुत्तों का आतंक,

मंडलीय अस्पताल के सामान्य ओपीडी में हर चौथा मरीज डॉग बाइट से पीडि़त

-गली और मोहल्लों से निकलने में भी होती परेशानी, लोगों के पीछे पड़ जाते हैं कुत्ते

-शहर में आवारा कुत्तों की आबादी है एक लाख से ज्यादा

शहर में डॉग बाइट यानी कुत्ते का काटना एक बड़ी समस्या बन गई है. यहां हर रोज सैकड़ों लोग डॉग बाइट के शिकार हो रहे हैं. इनमें ज्यादातर लोग गलियों और सड़कों पर खुले घूमने वाले कुत्तों का निशाना बन रहे हैं. सरकारी अस्पतालों में डॉग व मंकी बाइट के पीडि़तों की संख्या में इजाफा हो गया है. मंडलीय हॉस्पिटल में रोजाना 150 से ज्यादा मरीज रैबीज का इंजेक्शन लगवाने पहुंच रहे है. एक साथ इतने मरीजों को देखकर डॉक्टर्स भी हैरान हैं. चिकित्सकों की मानें तो 250 मरीजों की ओपीडी में हर पांचवा मरीज डॉग बाइट का आ रहा है. जिला अस्पताल में भी यही स्थिति है. बता दें कि हर गली, मोहल्ले में कुत्तों का झुंड रोजाना सैकड़ों लोगों को शिकार बना रहे हैं. बावजूद इसके नगर निगम की टीम इन कुत्तों को पकड़ने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखा रही है. ऐसे में न तो कुत्तों को वैक्सीन दी जा रही न ही की जनसंख्या पर कंट्रोल हो रहा.

सर्दी में हो जाते हैं खूंखार

जानकारों की मानें तो ठंड के सीजन में आवारा कुत्ते इरिटेट होकर अधिक खूंखार हो जाते हैं. यही वजह है कि इस सीजन में डॉग बाइट के मामले अधिक आते हैं. आंकड़ों पर गौर करें तो शहर में हर घंटे करीब 8 से 10 लोग डॉग बाइट के शिकार हो रहे हैं. इनके आतंक का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पूरे जिले में हर महीने डॉग बाइट के करीब 8 हजार लोग हॉस्पिटल पहुंच रहे हैं. इसमें सरकारी व प्राइवेट हॉस्पिटल शामिल है. मंडलीय अस्पताल के चीफ फार्मासिस्ट जेएस उपाध्याय की मानें तो पिछले दो सप्ताह से रोजाना 75 डॉग बाइट के नए मरीज आ रहे हैं. जबकि इंजेक्शन लगवाने वाले कुल मरीजों की संख्या 170 से ज्यादा है.

-निगम की अनदेखी

मंडलीय अस्पताल प्रशासन का कहना हैं कि आवारा कुत्तों को पकड़ने का जिम्मा नगर निगम का है. निगम का कुत्तों को पकड़ने का काम ढीला है. आवारा पशुओं को लेकर निगम का काम ठीक होता तो शायद पीडि़तों की संख्या इतनी न बढ़ती.

-पालतू भी काट रहे

यहां लोग सिर्फ आवारा नहीं पालतू कुत्तों का भी शिकार हो रहे हैं. अधिकारियों का कहना हैं कि पीडि़तों में 20 फीसदी मामले पालतू कुत्तों के काटे जाने के होते है. लोग मॉर्निग व नाइट में अपने कुत्ते खुले छोड़ देते हैं. ऐसे में ये मौका पाकर लोगों को दबोच लेते हैं. प्रशासन को इनके खिलाफ भी कोई नियम तय करना करना चाहिए.

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डॉग बाइट के तीन ग्रेड होते है. जो बाइट की गहराई पर डिपेंड करता है.

ग्रेड वन

- अगर कुत्ता प्यार से भी चाटता है, तो होशियार हो जाएं

- अगर कुत्ते में रैबीज़ का इंफेक्शन है तो शरीर में भी रैबीज़ के वायरस आने की आशंका बनी रहती है. खासकर अगर कुत्ते ने शरीर के उस कटे हुए हिस्से को चाट लिया हो.

ग्रेड टू

- कुत्ते के काटने के बाद स्किन पर उसके एक या दो दांतों के निशान दिखाई दे तो एहतियात बरतना जरूरी है.

-कुत्ते के काटने की अनदेखी घातक हो सकती है. रैबीज का वायरस एक बार शरीर में जाकर सालों तक रह जाता है.

ग्रेड थ्री

-आमतौर पर कुत्ता हाथ, पैर या चेहरा में से किसी एक जगह पर ही काटता है.

-हाथ या चेहरे पर काटने के बाद एक भी गहरा निशान बनता है तो यह खतरनाक है.

-क्या है रैबीज

रैबीज एक वायरस है. अगर यह किसी जानवर में हो और वह जानवर हमें काट ले खासकर कुत्ता, बिल्ली या बंदर तो इंसान में भी रैबीज हो सकता है. यह वायरस सेंट्रल नर्वस सिस्टम को फेल कर देता है, जिससे पीडि़त इंसान सामान्य नहीं रह पाता.

बचाव

- कुत्ते, बिल्ली या बंदर के काटने के 24 घंटे के अंदर एंटी रैबीज इंजेक्शन जरुर लगवाएं. 15 दिन में चार इंजेक्शंस लगवाना होता है.

- प्राइवेट हॉस्पिटल में वैक्सिनेशन का करीब 1200 रुपये खर्च आता है. लेकिन सरकारी अस्पतालों में यह फ्री में है.

कुत्तों को पकड़कर उनकी नसबंदी के लिए नगर निगम की ओर से दो एंजेंसी काम कर रही हैं. इनकी संख्या इतनी ज्यादा है कि इन्हें रखना भी मुश्किल है.

असलम अंसारी, चिकित्साधिकारी, पशु चिकित्सालय

जुलाई से अब तक 4 हजार कुत्तों की नसबंदी की गई है. अभी भी एजेंसी अपना काम कर रही है. कुत्तों से मुक्ति पाने के लिए एजेंसी का बजट बढ़ाना होगा. एक कुत्ते पर 500 रुपए का खर्च आता है, लेकिन निगम सिर्फ 290 रुपए ही देता है.

संदीप सेन गुप्ता, इंचार्ज-एजेंसी