-फुटबॉल एसोसिएशन और खेल विभाग की आपसी खींचतान से मर रहा फुटबॉल का खेल, शहर में कोचिंग संस्थानों का अभाव

-70 के दशक में 20 से ज्यादा थे क्लब, अब पांच भी नहीं बचे

एक समय था कि संतोष ट्रॉफी हो या सुब्रत कप, दोनों में बनारस के फुटबॉलर्स की धाक हुआ करती थी. कप्तानी से लेकर कोच तक में बनारस के फुटबॉलर्स अपना जलवा बिखेरते थे. मगर, अब होने वाले फुटबॉल टूर्नामेंट में बनारस के खिलाडि़यों का नाम ही शामिल नहीं मिलता. इक्का-दुक्का खिलाड़ी ही स्टेट, नेशनल तक का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. फुटबॉल से ऐसी बेरुखी के लिए जितना जिम्मेदार यहां का खेल विभाग है, उतना ही यहां की कोचिंग व्यवस्थाएं भी. सत्तर के दशक में जहां 20 से ज्यादा क्लब हुआ करते थे. वहीं अब गिनती के पांच भी नहीं बचे. फुटबॉल एसोसिएशन और खेल विभाग की आपसी खींचतान का ही रिजल्ट है कि नए फुटबॉलर्स की पौध नहीं निकल पा रही है.

एक भी टूर्नामेंट नहीं

यूं तो नब्बे के बाद शहर में नेशनल, इंटरनेशनल खिताब होते रहे लेकिन धीरे-धीरे बनारस से मेजबानी छिनती गई. अब स्थिति यह हो गई है कि एक भी इंटरनेशनल टूर्नामेंट बनारस में नहीं होता. बेनियाबाग ग्राउंड, डीएलडब्ल्यू ग्राउंड, यूपी कॉलेज, विद्यापीठ ग्राउंड सहित सिगरा स्टेडियम में नेशनल-इंटरनेशनल फुटबॉल टूर्नामेंट हुआ करते थे. मगर, बीते डेढ़ दशक में फुटबॉलर्सं के प्रोत्साहन में कमी और एसोसिएशन की राजनीति के चक्कर में मैदान तो खराब हुआ ही. फुटबाल खेल भी समाप्त होने के कगार पर पहुंच गया.

बढ़े एक्टिविटी तो सुधरे हालात

पहले स्कूल्स-कॉलेजेज फुटबॉल टूर्नामेंट में स्टूडेंट्स बढ़-चढ़कर प्रतिभाग करते थे. स्कूल-कॉलेज से निकलकर कितने प्लेयर्स नेशनल-इंटरनेशनल फुटबॉल मैच खेलकर बनारस की चमक बढ़ाए थे. मगर, अब स्कूल्स-कॉलेजेज में भी खेल को लेकर एक्टिविटी नहीं के बराबर रह गई है. आउटडोर गेम के अलावा इंडोर गेम को ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं. शायद एक वजह यह भी है कि अच्छे प्लेयर नहीं निकल पा रहे हैं.

इन क्लब का होता था जलवा

बनारस में ऐसे-ऐसे फुटबॉल क्लब हुआ करते थे कि सामने वाली टीम सिर्फ नाम सुनकर ही तनाव में आ जाती थी. बनारस के क्लबों का दबदबा देश के कोने-कोने में होता था. बनारस स्पोर्टिग क्लब, हीरोज स्पोर्टिग क्लब, नेशनल स्पोर्टिग क्लब, स्टेट फुटबॉल क्लब सहित बीस क्लब्स ऐसे हुआ करते थे जो प्लेयर्स को कोचिंग देते थे लेकिन अब इनमें से सिर्फ तीन-चार ही बचे हुए हैं. उनकी भी हालत ठीक-ठाक नहीं है.

वर्तमान में यह चल रहा कोचिंग

सेंचुरी स्पोर्टिग क्लब

बनारस स्पोर्टिग क्लब

पुलिस लाइन

विद्यापीठ

शिवपुर मिनी स्टेडियम

फुटबॉल को बढ़ावा देने के लिए खेल मंत्रालय को ध्यान देने की जरूरत है. प्राइमरी स्कूल में कैंप लगाकर बच्चों को फुटबॉल खेल के प्रति अवेयर करने की जरूरत है. यदि ऐसा नहीं हुआ तो आने वाले समय में फुटबॉल खेल का नाम ही विलुप्त हो जाएगा.

फरमान हैदर, साई कोच