छ्वन्रूस्॥श्वष्ठक्कक्त्र: एमजीएम हॉस्पिटल के 10 चिकित्सकों ने हर साल चार बीमारियों के रिसर्च का बेड़ा उठाया है. कॉलेज में इस वर्ष चार चिकित्सकों द्वारा रिसर्च टॉपिक को प्राथमिकता दी जाएगी. इसके बाद हर साल चार अलग-अलग बीमारियों पर रिसर्च किया जाएगा. रिसर्च को सफल बनाने के लिए इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आइसीएमआर) ने अलग से डिपार्टमेंट ऑफ हेल्थ रिसर्च (डीएचआर) की स्थापना की है. इसका मु2य उद्देश्य देशभर में प्रतिवर्ष नई-नई विकसित होने वाली बीमारियों पर रिसर्च व उसका निदान निकालना है. साथ ही चिकित्सकों को रिसर्च के प्रति प्रोत्साहित करना है. सोमवार को दिल्ली से पहुंची आइसीएमआर व रांची से विशेषज्ञ चिकित्सकों से एमजीएम कॉलेज के चिकित्सकों ने अपने रिसर्च टॉपिक से अवगत कराया. टीम में आइसीएमआर के साइंटिस्ट-ई डॉ. आशु ग्रोबर, रांची से डॉ. विवेक कश्यप, डॉ. आरके दयाल, डॉ. देवेश शामिल थे. वहीं एमजीएम मेडिकल कॉलज के प्रिंसिपल डॉ. एसी अखौरी ने सभी का स्वागत करते हुए अपने योजनाओं से अवगत कराया.

हर साल अलग-अलग बीमारियां

झारखंड में कभी एंथ्रे1स तो कभी अज्ञात बीमारी मौत का कारण बनता है. इसके कारण का पता लगाने के लिए प्रदेश में सुविधा नहीं थी लेकिन अब यह विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम इसपर भी रिसर्च कर सकेगी. रिसर्च के लिए एमजीएम कॉलेज में अत्याधुनिक लैब का निर्माण किया गया है. वहीं प्रथम चरण में 15 लाख रुपये का आवंटन किया गया है.

जानलेवा बीमारियों का इलाज होगा संभव

कैंसर, किडनी, हृदय रोग, मधुमेह, अस्थमा सहित अन्य नान क6यूनिकेबल रोगों पर रिसर्च होने के बाद निकलकर सामने आने वाले कारणों पर विशेष जोर दिया जा सकेगा. एमजीएम के मल्टी डिसिप्लिनरी रिसर्च सेंटर में मेडिकल के विभिन्न क्षेत्रों में रिसर्च किया जाएगा. इसके बाद सरकार की ओर से उसके रोकथाम के उपाय पर कदम उठाए जाएंगे.

रिसर्च के कई फायदे

मेडिकल कॉलेज में रिसर्च होने से चिकित्सक व छात्रों को काफी कुछ सीखने को मिल सकेगा. इससे रोगों का सटीक इलाज के साथ-साथ देश सहित झारखंड के छात्रों को औषधीय पौधों पर शोध एवं अनुसंधान का मौका भी मिलेगा. साथ ही ऑटो इ6यून बीमारी या अनुवांशिक रोगों का भी निदान खोजा जाएगा.

बढ़ रहीं नन क6यूनिकेबल बीमारियां

आइसीएमआर के साइंटिस्ट-ई डॉ. आशु ग्रोबर ने बताया कि आधुनिकता की दौर में लाइफ स्टाइल से होने वाली बीमारियां तेजी से बढ़ी है. इसलिए नान क6यूनिकेबल बीमारियां पर विशेष जोर दिया जा रहा है. पहले क6यूनिकेबल बीमारियों पर ही फोकस होता था. सभी राज्यों में रिसर्च पर विशेष जोर दिया जा रहा है ताकि उसका निदान निकाला जा सके. झारखंड में जन्म के समय बच्चों का वजन कम होना चिंता का विषय है. वहीं शहरी क्षेत्रों में अधिक वजन के मामले बढ़ रहे है. कम वजन की वजह से बच्चों में इंफे1शन तेजी से फैलता है.

इन बीमारियों पर होगी रिसर्च

- डॉ. वनिता सहाय (ले1चरर, एनाटोमी विभाग) : कोल्हान क्षेत्र में किशोरावस्था की महिलाओं में हाइपोथायरायडिज्म का परिणाम और आदिवासी महिलाओं के प्रजनन आयु समूह का परिणाम.

- डॉ. नीलम चौधरी (एसोसिएट प्रोफेसर, फिजियोलॉजी विभाग) : युवा वर्ग में हिमोग्लोबिन और एल्बिन स्तर के बीच संबंध.

- डॉ. यूएस सिंह (असिस्टेंट प्रोफेसर, पैथोलॉजी विभाग) : सबर जनजाति में हिमोग्लोबिन के रूपों का अध्ययन.

- डॉ. आरके महतो (असिस्टेंट प्रोफेसर, माइक्रोबायोलॉजी) : किशोर व स्कूली बच्चों में अधिक वजन का फैलाव.

- डॉ. सुजाता सहाय (असिस्टेंट प्रोफेसर, बायोकेमेस्ट्री विभाग) : कोल्हान क्षेत्र की आबादी में पित्त पत्थरों की बीमारी और आयरन की कमी के संबंध में एक अवलोकल संबंधी अध्ययन.

- डॉ. सुनिता कुमारी (ट्यूटर, एनाटोमी) : कोल्हान क्षेत्र की जनजातीय और गैर आदिवासी जनसं2या में सिकल सेल एनीमिया के एटिओपैथोजेनेसिस में प्रेरक कारकों पर शोध.

- डॉ. के प्रसाद (असिस्टेंट प्रोफेसर, पैथोलॉजी) : आदिवासी बच्चों में कुपोषण का प्रसार सहित अन्य.

- डॉ. अनिता कुमारी (ट्यूटर, फिजियोलॉजी विभाग) : कोल्हान क्षेत्र में रजोनिवृत्ति वाली महिलाओं के पूर्व और बाद में सीरम कैल्शियम का स्तर का अध्ययन.

- डॉ. अतुल प्रकाश (ट्यूटर, फिजियोलॉजी विभाग) : मधुमेह के परिवार के इतिहास के साथ यूरिक एसिड स्तर का अनुमान और मधुमेह के कोई परिवारिक इतिहास नहीं है.