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BAREILLY: भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी 'गणेश चतुर्थी' थर्सडे को स्वाति नक्षत्र के दुर्लभ संयोग में मनाई जाएगी. इस दिन भ्रदा 12 सितम्बर 2018 वेडनसडे की मध्य रात्रि प्रात: काल 03:24 से प्रारम्भ होकर 13 सितम्बर 2018 थर्सडे दोपहर 02:54 मिनट तक रहेगी. इसका निवास पाताल लोक में है साथ ही गणेश जी का जन्म भी भद्रा काल मे हुआ था. इसीलिए भद्रा का प्रभाव नगण्य रहेगा. विशेष बात यह भी है कि स्वाति नक्षत्र के साथ ही चन्द्रमा का तुला राशि में गुरूदेव बृहस्पति के साथ होना प्रबल गजकेशरी योग का निर्माण होना घटित हो रहा है. वही शुक्र एवं चन्द्रमा का योग भी कला निधि नामक योग का निर्माण कर रहा है, इसके साथ ही एन्द्र योग, विषकुम्भकरण सम्पूर्ण दिन रात पर्यन्त रहेगा. बालाजी ज्योतिष संस्थान के ज्योतिषाचार्य पं. राजीव शर्मा ने बताया कि इस दिन शुक्र भी स्वयं अपनी तुला राशि में विद्यमान रहकर राजयोग का निर्माण कर रहा है. यह संयोग सुख व समृद्धि की वृद्धि करेगा. आभूषण, मकान और वाहन खरीदना और नया व्यापार करना शुभ रहेगा.

गणपति स्थापना मुहूर्त

प्रात: 10:42 से अपराह्नन 01:46 तक (चर, लाभ के चौघडि़या में)

सायं काल मुहूर्त-04:49 से सायं 7:49 (शुभ एवं अमृत के चौघडि़या में)

वृश्चिक लग्न-पूर्वाह्न 11:02 से अपराह्न 01:20

राहुकाल-अपराह्न 01:50 से 03:23 तक

सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त - अपराह्न 12:14 बजे से 01:20 बजे तक

(वृश्चिक लग्न, अभिजित मुहूर्त एवं लाभ के चौघडि़या)


शुभ मुहुर्त में करें स्थापित

भगवान गणेश विघ्न हर्ता, साथ ही सर्व मंगलायकर्ता भी हैं, भगवान गणेश सभी प्रकार की मान्यताओं को पूर्ण करने वाले हैं. ब्रह्मा, शिव और विष्णु ने गणेशजी को कमरें में विघ्न डालने का अधिकार तथा पूजन के उपरान्त उसे शान्त कर देने का साम‌र्थ्य प्रदान किया है. सभी गणों का स्वामी बनाया है. भगवान गणेश का वर्तमान स्वरूप गजानन रूप में पार्वती-शिव पुत्र के रूप में पूजा जाता है, यह उनका द्वापर युग का अवतार है, सतयुग में भगवान गणेश महोत्कट विनायक के नाम से प्रसिद्ध हुए थे, जिनका वाहन सिंह है. त्रेता युग में मयूरेश्वर के नाम से जाने गए, जिनका वाहन मयूर हैं. द्वापर युग का प्रसिद्ध रूप गजानन है, जिसका वाहन मूषक है और कलयुग के अन्त में भगवान गणेश का धर्मरक्षक धूम्रकेतू प्रकट होगा. भगवान गणेश धनप्रदायक भी हैं. इसलिए गणपति का प्रवेश एवं स्थापना शुभ मुहूर्त में करना श्रेष्ठ रहता है. सिद्धि विनायक व्रत भाद्र शुक्ल चतुर्थी को किया जाता है.

पूजन सामग्री:-

कुमकुम, केसर, अबीर, गुलाल, सिन्दूर, पुष्प, चावल, चौसरे, ग्यारह सुपारियां, पंचामृत, पंचमेवा, गंगाजल, बिल्वपत्र, धूप बत्ती, दीप, नैवेद्य लड्डू पांच, गुड़ प्रसाद, लौंग, इलायची, नारियल, कलश, लाल कपड़ा, सफेद कपड़ा, बरक, इत्र, पुष्पहार, डंठल सहित पान, सरसो, जनेऊ, मिश्री, बताशा और आंवला.

गणेश चतुर्थी पर ऐसे करें पूजन:-

एक चौकी पर लाल रेशमी वस्त्र बिछा कर उसमें मिट्टी, धातु, सोने अथवा चांदी की मूर्ति, ध्यान आह्वान के बाद रखनी चाहिए. ऊं गं गणपतये नम: कहते हुए पूजन सामग्री गणेशजी पर चढ़ाए. एक पान के पत्ते पर सिन्दूर में थोड़ा घी मिलाकर स्वास्तिक चिन्ह बनाए. उसके मध्य में कलावा से पूरी तरह लिपटी हुई सुपारी रख दें. इन्हीं को गणपति मानकर एवं मिट्टी की प्रतिमा भी साथ में रखकर पूजन करें, गणेश जी के लिए मोतीचूर का लड्डू (5 अथवा 21) अवश्य चढ़ाएं. लड्डू के साथ गेहूं का परमल अवश्य चढ़ाएं, धान का लावा, सत्तू, गन्ने के टुकड़े, नारियल, तिल एवं पके हुए केले का भी भोग लगाए. देशी घी में मिलाकर हवन सामग्री के साथ हवन करें. अंत में गणेशजी की प्रतिमा के विसर्जन का विधान करना उत्तम माना गया है.

विशेष

-गणेशजी की पूजा सायं काल की जानी चाहिए, पूजनोपरान्त नीची नजर से चन्द्रमा को अ‌र्घ्य देकर ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए.

-घर में तीन गणेशजी की पूजा नहीं करनी चाहिए

-यदि चन्द्र दर्शन हो जाए तो मुक्ति के लिए हरिवंश भागवतोक्त स्यमन्तक मणि के आख्यान का पाठ भी करना चाहिए