- गोरखपुर यूनिवर्सिटी में पिछले कई वर्षो से लगना है वाई-फाई

- अब तक सिक्योरिटी मेजर्स कंप्लीट नहीं, जबकि नहीं हुआ कोई एमओयू

- हैंडओवर के इंतजार में वाई-फाई

GORAKHPUR: डीडीयू गोरखपुर यूनिवर्सिटी में वाई-फाई की राह आसान होती नहीं नजर आ रही है. एक रोड़ा हटता है तो रास्ते में दूसरा फिर अटक जाता है. वाई-फाई के साथ भी ऐसा ही कुछ हो रहा है. पहले सिक्योरिटी मेजर्स और एमओयू के पेंच में इसका काम अटका था, तो वहीं बीच में आंधी-तूफान का बहाना बनाकर जिम्मेदारों ने इसके लिए मोहलत मांगी थी. अब यूनिवर्सिटी में इसको लेकर फिर पेंच फंसता नजर आ रहा है. कार्यदायी संस्था जहां काम पूरा होने का दावा कर इसे हैंडओवर करने का दबाव बना रही है, वहीं उनके वर्कर्स लगातार काम में लगे हुए हैं. उनका दोहरा रवैया जिम्मेदारों को परेशान किए हुए है. वहीं दूसरी ओर अब प्रोग्रामर और इंजीनियर के बीच टशन से मामला फिर अटकता नजर आ रहा है. प्रोग्राम ने हाथ खड़े करते हुए किसी दूसरे को जिम्मेदारी देने के लिए लेटर लिखा है.

कमेटी अध्यक्ष पर भी फंसा पेंच

गोरखपुर यूनिवर्सिटी में वाई-फाई की जमीनी हकीकत जानने के लिए एक कमेटी बनाई गई थी. इसमें कायदतन सीनियर मोस्ट मेंबर यानि कि प्रोग्रामर को कमेटी का अध्यक्ष बनाया जाना चाहिए था, लेकिन यूनिवर्सिटी के कागजों में इसकी जिम्मेदारी एई को सौंप दी गई. वहीं जब बात कमेटी की रिपोर्ट की आई, तो कमेटी ने स्पष्टीकरण प्रोग्रामर से मांगना शुरू कर दिया. ऐसे में प्रोग्रामर ने रजिस्ट्रार को खेद प्रकट करते हुए एक लेटर लिखा है, जिसमें उन्होंने इस बात पर आपत्ति जताई है कि जो लेटर उन्हें मिला है, उसमें वह सिर्फ सदस्य हैं, ऐसे में उनकी जवाबदेही नहीं बनती है. वहीं उनसे स्पष्टीकरण मांगकर उन्हें इसका जिम्मेदार साबित करने की कोशिश की जा रही है.

नहीं थे कोई सिक्योिरटी मेजर्स

यूनिवर्सिटी के दो हॉस्टल्स में यूपीआरएनएन ने वाई-फाई फैसिलिटी फरवरी 2015 में ही स्टार्ट दी थी, लेकिन हैकिंग और अनऑथराइज एक्टिविटी को रोकने के लिए कोई सिक्योरिटी मेजर्स नहीं अपनाए गए थे. वहीं जिम्मेदारों ने कार्यदायी संस्था को खुली आजादी देते हुए बिना किसी टेक्निकल सेंक्शन और बिना एग्रीमेंट के ही काम शुरू करा दिया गया. ऑडिट में यह भी बात सामने आई है कि यूनिवर्सिटी और कार्यदायी संस्था के बीच न तो एग्रीमेंट ही हुआ और न ही दस्तावेजों पर जिम्मेदारों के सिग्नेचर ही हैं. वहीं काम में देर होने पर न तो किसी की लाइबिल्टी तय की गई है और न ही पेनाल्टी क्लॉज का ही जिक्र है.

सवा दो करोड़ हो गया पेमेंट

शासन की ओर से वाई-फाई के लिए 2.14 करोड़ रुपए स्वीकृत हुआ. यूपी राजकीय निर्माण निगम (यूपीआरएनएन) को काम सौंपा गया. इसमें कार्यदायी संस्था को मार्च 2014 में ही 1.06 करोड़ रुपए पेमेंट कर दिया. इसके बाद निर्माण कार्य तो शुरू हो गया. वहीं जुलाई 2015 में सेंक्शन 1.08 करोड़ का पेमेंट दिसंबर 2015 में कर दिया गया. फरवरी 2015 से यूनिवर्सिटी के दो हॉस्टल में इसकी फैसिलिटी भी मिलने लग गई. लेकिन ऑडिट में यह बात सामने आई कि महज तीन मंथ यानि मई 2015 में एनआईसी ने टेक्निकल सिक्योरिटी न होने की वजह से अनऑथराइज एक्टिविटी होती पाई और इससे उन्होंने इंटरनेट फैसिलिटी पर रोक लगा दी, जो अब तक बहाल नहीं हो सकी है.