साल भर के भीतर अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति की यह दूसरी भारत यात्रा है. भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी मई में काबुल दौरे पर गए थे. हामिद करज़ई की ये यात्रा एक ऐसे समय हो रही है जबकि पड़ोसी देश पाकिस्तान के साथ उसके संबंध बिगड़ गए हैं.

तालिबान

साथ ही अफ़ग़ानिस्तान ने ये फैसला भी किया है कि वो तालिबान के साथ चल रही शांतिवार्ता को रोक देगा. ये फैसला शांतिवार्ता में शामिल देश के पूर्व राष्ट्रपति बुरहानुद्दीन रब्बानी की हत्या के बाद लिया गया है. इस हत्या के लिए अफ़ग़ानिस्तान पाकिस्तान को ज़िम्मेदार बता रहा है. पाकिस्तान ने इस आरोप से इनकार किया है.

हालांकि अफ़ग़ानिस्तान हुकूमत की तालिबान से बातचीत को अमरीका का समर्थन हासिल था लेकिन भारत में इसके प्रति आशंका जताई जा रही थी. तालिबान को पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई का समर्थन होने की बात बार-बार दोहराई जाती रही है.

हामिद करज़ई की मुलाक़ात दोपहर बाद भारतीय विदेश मंत्री एसएम कृष्णा से होगी. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से उनकी मुलाक़ात शाम को तय हुई है.

रिश्ते

भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि हामिद करज़ई का दौरा दोनों देशों के आपसी संबंधों को मज़बूत करने का एक मौक़ा होगा. दोनों देश सामरिक, सुरक्षा और आर्थिक सहायता के क्षेत्र में कई संधियों पर हस्ताक्षर कर सकते हैं.

भारत ने अफ़ग़ानिस्तान को दो अरब डॉलर की आर्थिक सहायता दे रखी है. अफग़ानिस्तान के साथ संबंध भारत के लिए इस मामले में और भी अहम हो गया है क्योंकि वहां मौजूद विदेशी फ़ौजे वापस जाने वाली हैं.

लेकिन बीबीसी संवाददाता नितिन श्रीवास्तव से एक बातचीत में अफ़गानिस्तान में भारत के पूर्व राजदूत आईपी खोसला ने कहा है कि भारत को अफ़ग़ानिस्तान में कोई भी क़दम बहुत सोच समझ कर उठाना चाहिए.

उन्होंने कहा, "भारत को तय करना होगा कि वो किस हद तक जाकर अफ़गानिस्तान के पुनर्निर्माण में मदद कर सकता है. क्योंकि इस बात में कोई श़क नहीं है कि भारत के पडो़सी देश वहां बढ़ी हुई भारतीय भूमिका नहीं देखना चाहते हैं."

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