सरकारी अस्पतालों में नहीं मिलती सभी सुविधाएं, प्राइवेट की मोटी फीस

डॉक्टर्स की कमी, बाहर रैफर हो मरीज

50 से 75 मरीज औसत पड़ रहे एक डॉक्टर पर

Meerut. शासन की ओर से हर साल बजट में लोगों के मुफ्त इलाज के लिए कई घोषणाएं की जाती हैं, जबकि हकीकत यह है कि पुरानी घोषणाओं का पूरा लाभ ही मरीजों को नहीं मिल पा रहा है. आजादी के 72 सालों के बाद भी सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के लिए मरीजों को लंबी कतारें लगानी पड़ती है. अस्पतालों में डॉक्टर्स की भारी कमी है. कई योजनाएं बनी जरूर, लेकिन शुरु ही नहीं हो पाई. वहीं प्राइवेट अस्पतालों का महंगा इलाज मरीजों को और ज्यादा बीमार कर रहा है.

जिला अस्पताल का हाल

54 पद जिला अस्पताल में डॉक्टर्स के हैं

28 डॉक्टर्स ही उपलब्ध है.

26 डॉक्टर्स की कमी बनी हुई है.

1500 मरीज आते हैं रोजाना

यह है कमी

3-सर्जरी,

2- बेहोशी

2-रेडियोलोजिस्ट,

1-ऑर्थोपेडिक

2-टीबी व चेस्ट स्पेशलिस्ट,

2 ईएनटी,

1- डेंटल

1-यूरोलोजिस्ट,

1-न्यूरो सर्जन,

1-न्यूरो फिजिशियन,

1-कार्डियोलिस्ट,

1-नेफ्रोलॉजिस्ट,

1-ब्लड बैंक

9-डॉक्टर्स आईसीयू के लिए चाहिए.

मेडिकल कॉलेज का हाल

172 पद मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर, लेक्चरार के हैं. ये शिक्षा व चिकित्सा का कार्य करते हैं.

43 पद खाली पड़े हुए हैं.

एक असिस्टेंट प्रोफेसर की कमी फार्मेसी में हैं.

एक-एक पद मेडिसन में प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर व असिस्टेंट प्रोफेसर के खाली है.

एक-एक पद रेडियोथेरेपी में एसोसिएट प्रोफेसर व असिस्टेंट प्रोफेसर के खाली हैं.

एक एसोसिएट प्रोफेसर व 2 असिस्टेंट प्रोफेसर रेडियोडायोग्नोसिस में चाहिए.

1-1 पद एनेस्थिसिया के प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर व असिस्टेंट प्रोफेसर के खाली है.

1-1 पद हयूमन मेटाबॉलिज्म में एसोसिएट प्रोफेसर व असिस्टेंट प्रोफेसर के खाली है.

1 ईएनटी में प्रोफेसर, 1-एसोसिएट प्रोफेसर का पद खाली है.

1 पद गायनी में एसोसिएट प्रोफेसर का खाली है.

1 पद फार्माकोलॉजी में असिस्टेंट प्रोफेसर का खाली है.

3500 मरीज आते हैं रोजाना

महिला जिला अस्पताल

24 पद डॉक्टर्स के हैं.

10 डॉक्टर्स कुल मिलाकर यहां उपलब्ध है.

15 में से 4 गायनी डॉक्टर्स महिला रोग विशेषज्ञ है

300 मरीज आते हैं रोजाना

सीएचसी-पीएचसी का हाल

182 डॉक्टर्स के पद स्वास्थ्य विभाग के तहत सीएचसी, पीएचसी व अर्बन हेल्थ सेंटर पर हैं.

28 डॉक्टर्स यहां कम है.

154 पद ही भरे हुए है.

12 सर्जन चाहिए सिर्फ एक ही सर्जन है.

फिजिशयन और रेडियोलॉजिस्ट एक भी नहीं हैं.

नहीं शुरू हो सकी योजनाएं

जिला अस्पताल में नई इमरजेंसी अभी शुरु नहीं हो सकी. एमआईआर की सुविधा नहीं हैं. सर्जरी की सुविधा नहीं हैं. ऑक्सीजन प्लांट से सभी यूनिट में सप्लाई होने की योजना विस्तार नहीं ले पाई हैं. प्राइवेट वार्ड शुरु नहीं हो सके. डीएनबी कोर्स शुरु करने की योजना अभी तक शुरु नहीं हो पाई है.

मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन प्लांट पूरी तरह काम नहीं कर रहा हैं. फायर सेफ्टी सिस्टम नहीं बना. ई-हॉस्पिटल नहीं बन पाया, लेजर तकनीक से आंखों का इलाज शुरु नहीं हुआ, डिजिटल एक्सरे भी अटका हुआ हैं. प्राइवेट वार्ड व बर्न वार्ड शुरु नहीं हो पाया है. दिल, दिमाग और किडनी के डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं. प्रधानमंत्री स्वास्थ्य योजना के तहत बन रहा सुपर स्पेशलिटी अस्पताल व रिसर्च सेंटर पिछले डेढ़ साल से निमार्णाधीन है.

महिला अस्पताल में ई-हॉस्पिटल सेवा शुरु नहीं हो पाई. कंगारू यूनिट का लाभ नहीं मिल पाया.

सरकारी सुविधाएं बेहाल

सरकारी अस्पतालों में मरीजों को सिटी स्कैन, एमआरआई, ईसीजी, अल्ट्रासाउंड व एक्सरे अन्य जांचों के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है. नाम मात्र की फीस में उपलब्ध इन सुविधाओं के लिए अस्पताल प्रशासन हमेशा ही बजट न होने की रोना रोता रहता है. सुविधाएं न मिलने की वजह से मरीजों को बाहर महंगे सेंटर्स पर अपनी जांचे करवानी पड़ती है, जिसका फायदा उठाकर प्राइवेट सेंटर्स मरीजों से मनचाही फीस वसूलते हैं. यहां तक की मरीजों को सरकारी दवाईयों तक का लाभ नहीं मिल पाता है. डॉक्टर्स धड़ल्ले से सरकारी पर्चे पर बाहर की महंगी दवाइयां लिखते हैं ऐसे में मरीजों को मजबूरी में बाहर से इन्हें खरीदना पड़ता है.

सुविधाएं----सरकारी रेट ---प्राइवेट रेट

सिटी स्कैन-- 500 से 1500--2500 से 8000

ईसीजी- 25 से 70 रूपये---300 रुपये से शुरु

अल्ट्रासाउंड - 400 से 600 रुपये- 650 से शुरु

एक्सरे - 50 रुपये से 400 रुपये--600 से शुरु

खून की जांच- 1 रुपये से 150 रुपये तक- 50 रुपये से शुरु

मरीज होते हैं रेफर

मेरठ के दो बड़े सरकारी अस्पताल जिला अस्पताल और वेस्ट यूपी का हायर सेंटर लाला लाजपत राय स्मारक मेडिकल कॉलेज के चिकित्सालय में यूं तो हर साल करोड़ों का बजट दिया जाता है, लेकिन यहां मरीजों को इलाज के नाम पर सिर्फ चंद सुविधाएं ही मिलती है. चाहे कितने दावे क्यों न किए जाएं लेकिन हकीकत यही है कि यहां बड़ी और गंभीर बीमारियों का इलाज सरकारी और प्राइवेट किसी भी अस्पतालों में उपलब्ध नहीं हैं. कार्डियक, बर्न, न्यूरो सर्जरी, कैंसर आदि के गंभीर रोगियों को दिल्ली और अन्य बड़े शहरों के अस्पतालों में रैफर किया जाता है.

रैपिड राउंड इंटरव्यू

'हम मरीजों का पूरा ध्यान रखते हैं'

डॉ. आरसी गुप्ता, प्रिंसिपल, मेडिक कॉलेज

मरीजों को यहां इलाज के लिए भटकना पड़ता है.

हम मरीजों का पूरा ध्यान रखते हैं. मरीज को पूरा इलाज दिया जाएं. यहां मेरठ से ही नहीं बल्कि नौ जिलों से मरीज आते हैं ऐसे में उन्हें जानकारी नहीं हाेती है.

जांचे और अन्य टेस्ट के लिए लंबी कतारें लगती है.

हमारे पास संसाधन कम हैं. बजट के अनुसार की सुविधाएं मुहैया करवाई जा सकती है. मरीज ज्यादा है और सुविधाएं कम है. ऐसे में जिन मरीजों को ज्यादा जरूरत होती हैं उन्हें पहले सुविधा दी जाती है.

मरीजों को बाहर की दवाइयां लिखी जाती है.

शासन की ओर से जो भी दवाइयां उपलब्ध होती है उन्हें मरीजों को दिया जाता है. बाहर की दवाइयां लिखने पर मनाही है.

डॉक्टर्स की कमी क्यों पूरी नहीं होती है.

कई खाली पदों के लिए डॉक्टर्स की भर्ती हुई थी लेकिन किसी ने भी ज्वाइन नहीं किया हैं, जितने डॉक्टर्स उपलब्ध हैं, उनसे ही व्यवस्था चलाई जा रही है.

व्यवस्था सुधारने के लिए क्या किया जा रहा है.

अस्पताल में व्यवस्था सुधारने के लिए हम लगातार काम कर रहे हैं. शासन को सभी पहलुओं पर अवगत कराया जा रहा है. इसके अलावा हम और भी योजनाएं बना रहे हैं.

सरकारी इलाज मरीजों के लिए बहुत मुश्किल है. सरकार बस योजनाओं में ही पैसा खर्च करती रहती है लेकिन करोड़ों रूपये लगाने के बाद यह बंद हो जाती है. इसका फायदा आम आदमी को नहीं मिल पाता है.

गरिमा भारद्वाज

सरकारी सुविधाएं लोगों की पहुंच से दूर होती जा रही है. यहां की बेहाल सेवाओं के चलते लोग प्राइवेट में जाते हैं और यहां बीमारी को बढ़ा-चढ़ाकर बताया जाता है और मरीजों से मोटी फीस ली जाती है.

सुनीता टंडन

प्राइवेट अस्पतालों में इलाज लगातार महंगा होता जा रहा है. दवाइयां और लैब टेस्ट से बोझ से मरीज और ज्यादा बीमार हो जाता है. सरकारी अस्पतालों में मिलने वाली सुविधाएं बेहतर नहीं होती है.

गोविंद