- 60 सेंटीग्रेड तक इंजन के भीतर का चल रहा टेम्प्रेचर

- खिड़की बंद करने से उमस और खोलने पर लग रही लू

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BAREILLY : लोको पायलट जिन पर सुरक्षित रेल संचालन की जिम्मेदारी होती है, जिनकी एक छोटी सी गलती ट्रेन में सफर करने वाले हजारों रेल यात्रियों की जिंदगी खतरे में डाल सकती है, उनकी रेल प्रबंधन को जरा भी परवाह नहीं है. भीषण गर्मी के कारण इंजन के भीतर का टेम्प्रेचर बढ़ने से लोको पायलट लू के शिकार हो रहे हैं. ट्रेन की खिड़की बंद करने से इंजन में उमस होने लगता हैं, जिसकी वजह से लोको पायलट बीमार हो रहे है. उन्हें मेडिकल लीव लेना पड़ रहा है.

रोजाना पायलट हो रहे बीमार

देखा जाए तो रेल के एक छोटे से लेकर उच्च अधिकारी भी अपने ऑफिस में इस मौसम में बगैर एसी, कूलर और फैन के बैठ नहीं पाते हैं. वहीं, लोको पायलट 12 से लेकर 14 घंटे तक बिना एसी, कूलर और फैन के दिन-रात अपना पसीना बहाते हुए ट्रेन चला रहे हैं. ट्रेन चलने के दौरान जो हवा लगती है, उसी से उन्हें संतोष करना पड़ रहा है. चूंकि, खिड़की, दरवाजे का कांच बंद कर देने से इंजन के भीतर का टेम्प्रेचर इतना बढ़ जाता है, कि उन्हें मजबूरी में खिड़की खोलनी पड़ती है. गर्म हवा के थपेड़े के चलते लोको पायलट लू का शिकार हो जा रहे हैं. रोजाना 1 से 2 लोको पायलट और असिस्टेंट लोको पायलट बीमार पड़ रहे हैं.

इंजन का टेम्प्रेचर 78 सेंटीगे्रड तक होता है

इस समय सामान्य तौर पर टेम्प्रेचर 32 से 37 के बीच चल रहा है. लेकिन इंजन के भीतर का इस समय टेम्प्रेचर 45 से 47 के बीच है. कभी-कभी यह टेम्प्रेचर 50 से 60 सेंटीग्रेड तक पहुंच जाता है. लोको पायलट हेमंत ने बताया कि गर्मी के दिनों में मीटर इंजन का टेम्प्रेचर 78 तक बताता है. इससे मात्र 15-20 सेंटीग्रेड कम ही टेम्प्रेचर भीतर का होता है. गर्मी लगने से थकावट महसूस होता है. रेल मंत्रालय द्वारा गठित हाई पावर त्रिपाठी कमेटी ने अपनी सिफारिशों में अगस्त 2013 के पेज संख्या में 53 में यह स्वीकारा है कि लोकोमोटिव में सुविधा के कमी के चलते गर्मी और ठंड में काफी कष्ट झेल कर लोको पायलट ड्यूटी करते है. गर्मी के मौसम में लोको कैब के भीतर तापमान 60 सेंटीग्रेड तक पहुंच जाता है. वहीं ठंड के मौसम में खिड़की और दरवाजे के रास्ते आने वाली हवा के कारण तापमान 5-6 डिग्री तक हो जाता है.

लू के अलावा और भी कई समस्याएं

एक्सपर्ट की मानें तो लोको कैब की खराब स्थिति और 80 डेसीबल तक सीटी की आवाज में ड्यूटी करने के दौरान लोको पायलट बगैर मल-मूत्र त्याग किए 25 केवी के उच्च मेग्नेटिक फिल्ड में लगातार 10 से 12 घंटे तक कार्य करने पर लोको पायलट हाई ब्लड प्रेशर, हाईपरटेंशन, आंत और पेट की बीमारी, पथरी और प्रोस्टेट तथा दिल की बीमारी होने की आशंका ज्यादा होती है. लोको पायलट ने बताया कि वह हीटस्ट्रोक से बचने के लिए खुद ही कोशिश करते हैं. इसके लिए पारम्परिक तरीकों की मदद लेते हैं. पांच लीटर पानी साथ में रखना, कानों पर गमझा बांधना, ग्लूकोज साथ में रखना आदि शामिल हैं.

सिर्फ स्पेशल ट्रेनों के इंजन में एसी

लोको पायलट का कहना है कि सिर्फ 3-4 फीसदी ट्रेनों में एसी और टॉयलेट का व्यवस्था है. वह भी स्पेशल ट्रेनों में बाकी ट्रेनों में एसी तो दूर की बात टॉयलेट तक नहीं है. राजधानी, गरीबरथ, दुरंतो एक्सप्रेस और शताब्दी ट्रेनों के इंजन में एसी लगे हुए हैं.

फैक्ट्स एंड फीगर

डिवीजन में

- 2300 पद लोको पायलट के मुरादाबाद डिवीजन में हैं.

- 1600 पद पर लोको पायलट काम कर रहे हैं.

- 700 पद लोको पायलट के खाली चल रहे हैं.


बरेली में

- 250 पद लोको पायलट बरेली में हैं.

- 186 पद पर लोको पायलट काम कर रहे हैं.

- 107 पद असिस्टेंट लोको पायलट और 79 पद लोको पायलट के हैं.

- 64 पद लोको पायलट के खाली चल रहे हैं

एक-दो लोको पायलट रोजाना बीमार हो रहे हैं. ट्रेन चलने के दौरान जो हवा लगती है उसी से संतोष करना पड़ा है. रेलवे बोर्ड के चेयरमैन के समझ इस बात को रखी गई है.

राजेश दूबे, इंचार्ज, लोको पायलट सेक्शन