हिन्दुस्तानी एकेडेमी में 'समकालीन काव्यभाषा के निर्माण में ब्रजभाषा का अवदान' विषय पर संगोष्ठी

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ALLAHABAD: ब्रजभाषा देश की प्राचीनतम भाषा है. यह केवल ब्रज क्षेत्र में ही नहीं बल्कि देश के अधिकांश भागों में बोली और समझी जाने वाली भाषा है. मप्र के ग्वालियर, मुरैना, हरियाणा के पलवल व गुड़गांव की भाषा पर भी ब्रज भाषा का बहुत प्रभाव है. अवधी, बुंदेली, मैथिली, भोजपुरी व पंजाबी भाषाओं पर ब्रज की छाया है. यह बातें ब्रजभाषा के मर्मज्ञ विद्वान पद्मश्री मोहन स्वरूप भाटिया ने रविवार को हिन्दुस्तानी एकेडेमी में 'समकालीन काव्य भाषा के निर्माण में ब्रजभाषा का अवदान' विषय पर बतौर मुख्य वक्ता कही.

ब्रजभाषा में एकेडेमी न होना विडंबना

दूसरे प्रमुख वक्ता डॉ. श्रीवत्स गोस्वामी ने कहा कि समकालीन भारतीय साहित्यिक सृष्टि का महल ब्रजभाषा के चबूतरे पर खड़ा है. ब्रजभाषीय उत्तर प्रदेश में ब्रजभाषा अकादमी का न होना बहुत बड़ी विडंबना है. एकेडेमी के अध्यक्ष डॉ. उदय प्रताप सिंह व डॉ. ब्रजभूषण चतुर्वेदी ने ब्रज भाषा की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला. संचालन कोषाध्यक्ष रविनंदन सिंह ने किया. इस मौके पर पूर्व अध्यक्ष हरि मोहन मालवीय, डॉ. आभा त्रिपाठी, उमेश श्रीवास्तव, कैलाश नाथ पांडेय, शिवराम उपाध्याय आदि मौजूद रहे.

अध्यक्ष ने संभाला कार्यभार

हिन्दुस्तानी एकेडेमी के नए अध्यक्ष डॉ. उदय प्रताप सिंह ने संगोष्ठी के समापन पर अपना कार्यभार ग्रहण किया. डॉ. सिंह ने बताया कि एकेडेमी की पूर्व परंपराओं को सुदृढ़ कर उसके गौरवशाली इतिहास से जोड़ने का प्रयास किया जाएगा. इस मौके पर सचिव रवीन्द्र कुमार, कोषाध्यक्ष रविनंदन सिंह, संतोष तिवारी आदि ने बुके देकर डॉ. सिंह का स्वागत किया.

स्टडी रूम का लोकार्पण

संगोष्ठी के शुभारंभ से पहले एकेडेमी के अध्यक्ष डॉ. उदय प्रताप सिंह व पद्मश्री मोहन स्वरूप भाटिया ने लाइब्रेरी के नए स्टडी रूम का लोकार्पण किया. साथ ही रूम का अवलोकन भी किया.