लाइलाज बीमारी के चलते साथ ले जाने से कतरा रहे परिजन

अपनों के लिए तरस रही मरीजों की आंखें

केस-1

जिला अस्पताल में एडमिट को ठीक हुए एक हफ्ते से ज्यादा हो गया है लेकिन उसके परिजन उसे ले जाने का तैयार ही नहीं हैं. वह रोजाना एक-दो दिन की बात कहकर ले जाने वाली बात को टाल देते हैं.

केस-2

आईसोलेशन वार्ड में एडमिट रवि को उसके परिजन साथ रखने को तैयार नहीं हैं. परिवार में चार बच्चे होने के बावजूद वह पूरी तरह से अस्पताल के स्टाफ पर निर्भर होकर रह गए हैं. परिवार के किसी सदस्य ने अभी तक इनकी सुध नहीं ली है.

Meerut. जिला अस्पताल अब सिर्फ अस्पताल नहीं रह गया है. बल्कि कई ऐसे गरीब और लाचार मरीजों का ठिकाना बन गया है, जिनसे उनके अपने ही आंखें चुरा रहे हैं. जबकि मरीजों की आंखे टकटकी लगाए अपनों का इंतजार करती रहती हैं. अस्पताल के आईसोलेशन वार्ड में एडमिट मरीजों को उनकी लाइलाज बीमारी ने अपनों से दूर कर दिया है. दरअसल, लाइलाज बीमारी के साथ मरीज को हुई किसी साधारण बीमारी के चलते परिजनों द्वारा अस्पताल में एडमिट करा दिए जाते हैं. अस्पताल में उनकी साधारण बीमारी का इलाज हो जाने के बाद परिजन उन्हें लाइलाज बीमारी के चलते साथ ले जाने से मना कर देते हैं. परिजन यहां मिल रही सुविधाओं के चलते भी अपनों को यहां से ले जाने के लिए तैयार नहीं हैं.

अपनों से दूर

अस्पताल स्टाफ के मुताबिक एडमिट मरीजों की स्थिति काफी दयनीय है. सभी रिपोर्ट नॉर्मल हैं लेकिन लंबी बीमारी की वजह से इनकी मांसपेशियों और नसों में कमजोरी बहुत ज्यादा हो गई है. यह मरीज बिना सहारे के चलने और अन्य दैनिक क्रियाएं करने में असमर्थ हो गए हैं. जिस कारण से इन्हें काफी देखभाल की जरूरत है लेकिन परिजन इन्हें बोझ समझकर यहां से ले जाना ही नहीं चाहते हैं. कई बार लिखकर देने के बाद भी परिजन मरीजों को डिस्चार्ज कराने नहीं आते हैं.

मिलती है सुविधा

जिला अस्पताल के आईसोलेशन वार्ड में एडमिट मरीजों को रोजाना सुबह और शाम प्रॉपर खाना दिया जाता है. इसके अलावा मरीज को एक पैकेट दूध भी मिलता है. वहीं यहां एडमिट मरीजों की देखभाल, उनकी सफाई के लिए 24 घंटे वार्ड ब्वॉय की सहूलियत भी दी जाती है. यहां फ्री दवाइयों के साथ ही जरूरी जांचे भी नि:शुल्क होती है.

हमारा घर बहुत छोटा है. इसलिए अपने मरीज को घर नहीं ले जा रहे हैं. वहां ठीक से देखभाल करना काफी मुश्किल है. अस्पताल में बेहतर इलाज मिल जाता है.

असलम, तीमारदार

हम कई बार फोन करके तीमारदार को मरीज को ले जाने के लिए बोलते हैं. इनसे लिखवाया भी जाता है, बावजूद इसके तीमारदार न ले जाने का बहाना लगा देता है. मरीज को खुद से डिस्चार्ज नहीं किया जा सकता है. इनकी इंर्फोमेशन पुलिस में भी दी जाती है.

डॉ. सुनील कौशिक, सीएमएस, जिला अस्पताल