- अल्लाह के खास तोहफे को लेकर मुसलमानों में जबरदस्त उत्साह

- दरगाह मुबारक खां शहीद में चल रहे दर्स का हुआ समापन

GORAKHPUR: ईद को लेकर बाजारों की रौनक देखने लायक है. खरीददारों की भीड़ का आलम यह है कि शाहमारुफ, रेती, घंटाघर, उर्दू बाजार व जाफरा बाजार में पैदल चलना तक मुश्किल है. सारी रात लोग अपनी पसंद और जरूरत का सामान खरीदते नजर आए. कोई कपड़ा खरीद रहा है तो कोई सेवईयां ले जा रहा है. खुशियों और दावतों का त्योहार ईद अल्लाह की तरफ से अपने नेक बदों के लिए बेहतरीन तोहफा है. अल्लाह की ओर से अपने बंदों को दिए गए इस खास तोहफे को लेकर मुसलमानों में जबरदस्त उत्साह है. वहीं नार्मल स्थित दरगाह हजरत मुबारक खां शहीद मस्जिद में गुरुवार को बाद नमाज जोहर पहली रमजान से चल रहे दर्स का समापन हो गया. दर्स में ईद की नमाज का तरीका, ईद के आदाब व चांद के बारे में डीटेल्ड में इंफॉर्मेशन दी गई.

दो दिन मनाते थे खुशी

मुफ्ती मोहम्मद अजहर शम्सी ने बताया कि कुरआन शरीफ में अल्लाह तआला फरमाता है, रोजों की गिनती पूरी करो और अल्लाह की बड़ाई बोलो कि उसने तुम्हें हिदायत फरमायी. हदीस में है जब पैगंबर-ए-इस्लाम मदीने में तशरीफ लाए उस जमाने में अहले मदीना साल में दो दिन खुशी करते थे महरगान व नौरोज. पैगंबर-ए-इस्लाम ने फरमाया यह क्या दिन हैं? लोगों ने अर्ज किया जाहिलियत में हम इन दिनों में खुशी करते थे. पैगंबर-ए-इस्लाम ने फरमाया अल्लाह ने उनके बदले में इनसे बेहतर दो दिन तुम्हें दिए हैं ईद-उल-फित्र व ईद-उल-अजहा.

कुछ खाकर पढ़ने जाएं नमाज

उन्होंने बताया कि ईदगाह में ईद की नमाज अदा करना पैगंबर-ए-इस्लाम व आपके सहाबा की सुन्नत है. इसलिए कोशिश रहे ईद की नमाज ईदगाह में ही अदा करें. ईदगाह दो ईदों के लिए ही बनाई गई हैं. नमाज ईदगाह में जाकर पढ़ना और रास्ता बदल कर आना, पैदल जाना और रास्ते में तकबीरे तशरीक पढ़ना सुन्नत हैं. पैगंबर-ए-इस्लाम ईद-उल-फित्र के दिन कुछ खाकर नमाज के लिए तशरीफ ले जाते. ईदगाह को एक रास्ते से तशरीफ ले जाते और दूसरे से वापस होते. हदीस में है कि एक मर्तबा ईद के दिन बारिश हुई तो मस्जिद में हुजूर ने ईद की नमाज पढ़ी. ईद की नमाज वाजिब है और इसकी अदा की वही शर्ते हैं जो जुमे के लिए है. सिर्फ इतना फर्क है कि जुमे में खुत्बा शर्त है और ईद में सुन्नत.

बताया नमाज का तरीका

दर्स के दौरान मौलाना मकसूद आलम मिस्बाही ने ईद की नमाज का तरीका बताते हुए कहा कि ईद की नमाज आबादी से बाहर खुले मैदान में जमात के साथ अदा करनी चाहिए. बूढ़े, कमजोर अगर शहर की बड़ी मस्जिद में पढ़ लें, तो भी दुरूस्त है. ईदैन की नमाज के बाद खुत्बा पढ़ना और सुनना सुन्नत है. ईद की नमाज के बाद दुआ होगी. उसके बाद मुसाफा (हाथ मिलाना) व मुआनका (गले मिलना) करना जैसा उमूमन मुसलमानों में रिवाज है, बेहतर है कि इसमें खुशी का इजहार है. इत्र लगाना, ईदगाह को नमाज के लिए जाना सुन्नत है.