पटनिया के साथ दो-तीन दिन बिताने आया है 'भीखू म्हात्रे'

मनोज भले ही हिंदी सिनेमा के स्टार हैं, लेकिन बिहार आते ही उनका देसी अंदाज छलक उठता है. बिहार से ही निकले कई एक्टर्स भले ही भोजपुरी से ना जुडऩा चाहें, लेकिन मनोज को परहेज नहीं. वे भोजपुरी फिल्मों के बारे में खुलकर कहते हैं 'काहे ना करेब भोजपुरी सिनेमा, हमरा से बढिय़ा भोजपुरी के बोली?' उन्होंने बताया कि 'सत्या' हो या 'आरक्षण' या फिर 'मनी है तो हनी है', मैं सिर्फ कैरेक्टर देखता हूं.

मुझे पसंद भी है
उन्होंने बताया कि भोजपुरी फिल्में भी करूंगा, लेकिन उस लायक कैरेक्टर होना चाहिए. वैसे नीतू चंद्रा ने एक भोजपुरी मूवी का आइडिया सुनाया है, मुझे पसंद भी है. इसे डायरेक्ट शायद उनके भाई नितिन ही करें, लेकिन बात आगे तब बढ़ेगी, जब पूरी स्क्रिप्ट सुन लूं. अभी तक तो पॉजिटिव मूव है.

फिलहाल एक्टिंग में ही

बॉलीवुड से जुड़े बिहार एक्टर-डायरेक्टर्स का पॉलिटिक्स प्रेम नया नहीं है. शत्रुघ्न सिन्हा, शेखर सुमन हों या प्रकाश झा, सबकी जितनी नजदीकी बॉलीवुड से रही है उतनी ही पॉलिटिक्स से भी है. फ्यूचर में खुद के पॉलिटिक्स से जुडऩे के सवाल पर मनोज बाजपेयी थोड़ा असहज होते हैं. हालांकि इस पर जवाब एक ही होता है पॉलिटिक्स को 'नेवर' नहीं कहता, लेकिन फिलहाल एक्टिंग में ही रहना है.

चुन्नीलाल का ऑफर मिला था
मनोज बाजपेयी ने सत्या के भीखू म्हात्रे के कैरेक्टर को यादगार बना दिया, लेकिन उनकी ख्वाहिश 'देवदास' का कैरेक्टर प्ले करने की है. मनोज ने बताया कि मुझे देवदास के लिए ऑफर भी मिला था, लेकिन मैं कर नहीं सका. मुझे चुन्नीलाल का ऑफर मिला था. मनोज ने बताया कि गाइड, मुगल-ए-आजम, दिल दिया दर्द लिया, साहब बीवी और गुलाम जैसी फिल्में अगर दुबारा बनें, तो उनमें जरूर काम करना चाहेंगे.

जो कुछ हूं, दोस्तों की वजह से

इस अवसर पर मनोज बाजपेयी ने बताया कि आज वे जो कुछ भी हैं, अपने दोस्तों की वजह से हैं. बेतिया में पले-बढ़े मनोज बताते हैं कि शुरू से ही उन्हें उनके दोस्तों ने बहुत कुछ सिखाया. वे बताते हैं कि आज भी दोस्तों से जुड़े हैं. उन्होंने बताया कि संगत का कैरेक्टर पर बड़ा असर पड़ता है और मेरी संगत हमेशा अच्छी रही.