स्वामी रामकृष्ण परमहंस।

शुरुआत में चारों ओर से घेरा लगाकर पौधों को गाय-बकरी आदि से बचाना पड़ता है। एक बार वह पौधा बढ़कर बड़ा वृक्ष बन जाता है, तो फिर कोई भय नहीं रह जाता। तब तो सैकड़ों गाय-बकरियां आकर उसके नीचे आसरा लेती हैं। उसके पत्तों से पेट भरती हैं। इसी तरह साधना की प्रथम अवस्था में स्वयं को कुसंगति और सांसारिक विषय-बुद्धि के प्रभाव से बचाना चाहिए। एक बार सिद्धिलाभ हो जाने से फिर कोई भय नहीं रहता। तब कुभाव या किसी प्रकार की शक्ति आपका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी। इसके उलट अनेक संसारी लोग आपके पास आकर शांति प्राप्त करेंगे।

ज्यादा चतुर निकृष्ट चीज ही पाता है

अगर जीवन में ऊंचा उठना है तो गांठ बांध लें यह बात

सांसारिक विषय बुद्धि के प्रभाव से बचने के लिए अपने वाणी पर संयम रखना जरूरी हो जाता है। अपने भावों और भावनाओं तथा अपने श्रद्धा-विश्वास को अपने तक ही रखना चाहिए। उनके बारे में सभी से नहीं बताना चााहिए। ऐसा नहीं करने पर भारी हानि होती है। दूसरी तरफ स्वयं को ज्यादा चतुर समझना भी उचित नहीं है। कौआ खुद को कितना चालाक समझता है, लेकिन वह कभी फंदे में नहीं फंसता है। भय की तनिक आशंका होते ही उड़ जाता है। वह खाने की चीजों को भी बड़ी आसानी से उड़ा ले जाता है। इतना सब कुछ होते हुए भी वह निकृष्ट चीज खाता है। ज्यादा चालाकी करने का यही परिणाम होता है।

ऊंचा उठना है, तो पहले नम्र बनें

अगर जीवन में ऊंचा उठना है तो गांठ बांध लें यह बात

हमें हमेशा यह ध्यान रखना चाहिए कि ऊंचा उठना है, तो पहले नम्र बनना चाहिए। चातक पक्षी का घोंसला नीचे होता है, पर वह आसमान में बहुत ऊंचा उड़ता है। ऊंची जमीन में खेती नहीं होती है। उसके लिए नीची जमीन चाहिए, जहां पानी जम सके। तभी खेती हो सकती है। अकसर ज्ञान होने पर हमें दंडवत होना चाहिए। यदि कोई सुनने के लिए दबाव डाल रहा है, तो इस प्रकार का अहंभाव नहीं रखना चाहिए।

अज्ञान अवस्था में ही अहंकार रहता है। ज्ञान होने पर नहीं। जिसे अहंकार नहीं होता है, उसी को ज्ञानलाभ होता है। बरसात का पानी नीची जमीन पर ही ठहरता है। ऊंची जगह पर ठहर नहीं पाता।

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