कुशोत्पाटिनी अमावस्या भाद्रपद कृष्ण अमावस्या के पूर्वाह्न में मानी जाती है। मान्यता है कि धार्मिक कार्यों, श्राद्ध कर्म आदि में इस्तेमाल की जाने वाली घास यदि इस दिन एकत्रित की जाये तो वह वर्षभर तक पुण्य फलदायी होती है। बिना कुशा के की गई हर पूजा निष्फल मानी जाती है। 

पूजाकाले सर्वदैव कुशहस्तो भवेच्छुचि:।

कुशेन रहिता पूजा विफला कथिता मया॥

किसी भी पूजन के अवसर पर इसीलिए ब्राम्हण यजमान को अनामिका उंगली में कुश की बनी पवित्री पहनाते हैं। शास्त्र में 10 प्रकार का कुश बतलाया गया है। इनमें जो मिल सके, उसी को ग्रहण करें।

जिस कुशा का मूल सुतीक्ष्ण हो, अग्रभाग कटा न हो और हरा हो, वह देव और पितृ दोनों कार्यों में बरतने योग्य होती है। उसके लिए अमावस्या को कुशा वाले स्थल पर जाकर पूर्व या उत्तर मुख करके बैठें और कुश उखाड़ने के पूर्व प्रार्थना करें।

कुशाग्रे वसते रुद्र: कुश मध्ये तु केशव:।

कुशमूले वसेद् ब्रह्मा कुशान् मे देहि मेदिनी।।

'विरञ्चिना सहोत्पन्न परमेष्ठिन्निसर्गज।

नुद सर्वाणि पापानि दर्भ स्वस्तिकरो भव।।

इसके बाद ऊँ हूँ फट् मंत्र का उच्चारण करते हुए कुशा को दाहिने हाथ से उखाड़ें। पूजन मे इस कुश का प्रयोग वर्ष पर्यन्त होता है। इसे पूरे साल तक पवित्र माना जाता है। यदि य​​​ह अमावस्या सोमवार को होती तो इस दिन एकत्रित किया गया कुशा 12 वर्षों तक पवित्र रहता है।

-ज्योतिषाचार्य पं गणेश प्रसाद मिश्र, शोध छात्र, ज्योतिष विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय

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