इंदौर (शैलेंद्र बुंदेला)। लखनऊ के पास काकोरी स्टेशन में 9 अगस्त 1925 को ट्रेन से सरकारी खजाना लूटने के बाद आजाद एवं उनके साथियों की गिरफ्तारी के लिए ब्रिटिश हुकूमत ने जमीन- आसमान एक कर दिए। हालात को भांप आजाद साथियों से अलग होकर बुंदेलखण्ड आ गए और अपनी पहचान छुपाकर रहने लगे। यहां झांसी, ओरछा में रहकर उन्होंने संगठन को नए सिरे से तैयार किया। यहां से वह ब्रिटिश हुकूमत की गतिविधियों की टोह भी लेते रहे।

गिनती विश्व के अचूक निशानेबाजों में

बात 1929 के आस-पास की है, तत्कालीन दतिया नरेश महाराजा गोविंद सिंह की गिनती विश्व के अचूक निशानेबाजों में होती थी। दतिया में चंद्रशेखर आजाद को रियासत के दीवान नाहर सिंह बुंदेला ने आश्रय दिया। दीवान सिंह बुंदेला के बेटे दीवान वीर सिंह बुंदेला अब बुजुर्ग हो चले हैं। अपने पिता की बातों को याद करते हुए दीवान बताते हैं, बुंदेलखण्ड क्षेत्र में अज्ञातवास काट रहे चंद्रशेखर ने पिस्टल से अचूक निशानेबाजी की कला में महारथ हासिल करने के लिए पिता जी से संपर्क साधा था।

साइकल से दतिया आ जाया करते
इसके बाद आजाद अक्सर झांसी से उनाव के रास्ते साइकल से दतिया आ जाया करते। कुछ दिन हवेली (वर्तमान में गुगोरिया विश्वशांतिभवन) में रककर दीवान साहब से पिस्टल की निशानेबाजी की ट्रेनिंग लेते और वापस झांसी लौट जाते। झांसी में मास्टर रद्र नारायण सिंह के पास उन्हें आश्रय मिला, वह बसई में भी रहे। जब झांसी में ब्रिटिश पुलिस और सीआइडी की सक्रियता बढ़ती तो आजाद दतिया पहुंच जाते। बकौल दीवान वीर सिंह बुंदेला, दीवान साहब के अर्दली रहे देव सिंह खबास और मोहन सिंह चंद्रशेखर आजाद को मिस्त्री साहब के नाम से जानते थे। चूंकि रियासत के समय बंदूक आदि शस्त्र बहुतयात में हवेलियों में हुआ करते थे, सो हथियारों की मरम्मत भी आम बात थी।

किसी को भनक तक नहीं लगी
आजाद दतिया में दीवान नाहर सिंह से गुपचुप पिस्टल चलाना सीखते रहे पर किसी को भनक तक नहीं लगी। फरवरी 1931 में इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क मे  पुलिस से घिर जाने के बाद आजाद ने खुद को गोली मार ली और वह हमेशा के लिए भारत माता की गोद में सो गए। बाद में जब अखबारों में आजाद के फोटो प्रकाशित हुए तो देवसिंह खबास एवं अन्य अर्दलियों ने आजाद (मिस्त्री साहब) को पहचान लिया। तब राजा ने दीवान साहब को राज्य से निष्कासित कर दिया था।

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