शहरों में बढ़ रही असंगठित कामगारों की संख्या, सबके लिए सुविधा बढ़ाना जरूरी
नई दिल्ली (पीटीआई)।
दुनिया के गैर कृषि जीडीपी का 50 फीसदी हिस्सा असंगठित क्षेत्र के कंधों पर है। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया के बढ़ते शहरों में करोड़ों लोग असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे हैं। इन कामगारों की संख्या शहरों में काम करने वालों का 80 फीसदी है। डब्ल्यूआरआई ने 'शहरों में असंगठित कामगार और इस आर्थिक क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी : ग्लोबलाइजिंग ऐंड ऑर्गेनाइजिंग' पर एक रिपोर्ट जारी की है। इसके मुताबिक, शहरों में असंगठित क्षेत्र में कामगारों की संख्या बढ़ रही है। इसे देखते हुए शहरों में सबके लिए बेहतर सुविधाएं मुहैया कराने की जरूरत है।

स्ट्रीट वेंडर्स से कूड़ा बीनने वाले और घरों से काम करने वाले असंगठित कामगार
द वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट रिपोर्ट ने कहा कि असंगठित क्षेत्र के कामगारों में स्ट्रीट वेंडर्स से लेकर कूड़ा बीनने वाले तक शामिल हैं। इनमें घर से काम करने वाले ऐसे लोग भी हैं, कपड़े या अन्य वस्तुएं बनाते हैं। ऐसे कामगारों की संख्या दुनियाभर के शहरों में 50 से 80 प्रतिशत तक है। इनके कंधों पर गैर कृषि जीडीपी का 50 फीसदी की जिम्मेदारी है। अर्थव्यवस्था में इतनी बड़ी संख्या में उनकी भागीदारी होने के बावजूद वे कहीं नजर नहीं आते क्योंकि इस क्षेत्र के कामगार अपना लेखा-जोखा नहीं रखते जिससे आसानी से टैक्स की पहुंच से दूर रहते हैं। उनके गलत काम करने की वजह से संगठित क्षेत्र का कारोबार भी प्रभावित होता है, वे सार्वजनिक जगहों का अपने कारोबार के लिए इस्तेमाल करते हैं, इस क्षेत्र में स्थायीत्व का भी संकट है और सबसे बड़ी बात यहां जान जोखिम में रखकर लोगों से काम कराया जाता है।

असंगठित क्षेत्र के कामगारों को भी मिले वैधानिक पहचान, मिले सामाजिक सुरक्षा
रिपोर्ट के मुताबिक, शहरों में असंगठित क्षेत्र में 27 प्रतिशत हिस्सा पेशेवरों का है, 12 प्रतिशत कंस्ट्रक्शन, 9 प्रतिशत ट्रांसपोर्ट और 24 प्रतिशत हिस्सा ऐसे लोगों का है जो घरेलू काम और कूड़ा निस्तारण जैसे सेवाओं में लगे हैं। रिपोर्ट में इस बात की वकालत की गई है कि असंगठित क्षेत्र के कामगारों को शहरों में वैधानिक पहचान उपलब्ध कराई जाए और उन्हें आर्थिक और सामाजिक अधिकार भी दिए जाएं। साथ ही उनके लिए आधारभूत सेवाओं, सामाजिक सुरक्षा और प्रतिनिधित्व तक पहुंच आसान बनाई जानी चाहिए। विगो के अंतरराष्ट्रीय संयोजक मर्था ए चेन ने कहा कि असंगठित क्षेत्र के कामगारों को संगठित क्षेत्र के तहत लाने की जरूरत है। इसके लिए नीति बनाई जाए ताकि इस क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को सामाजिक और आर्थिक न्याय मिल सके।

सेवा ने मांगा हक, असंगठित क्षेत्र के लिए उदाहरण है महिलाओं का यह संगठन
एक उदाहरण का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में स्व रोजगार महिला संगठन (सेवा) ने असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली 15 लाख महिलाओं का एक यूनियन बनाया और शहर के सरकार के साथ मिलकर अपने लिए आवास, बिजली, सफाई और पानी जैसी मूलभूत सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए करार किया। इसके लिए शहर के संबंधित विभागों ने उनकी हर संभव मदद भी की। 2006 में भुवनेश्वर की स्थानीय सरकार ने फुटपाथ पर फेरी लगाने वालों के लिए बाजार की व्यवस्था भी की थी। डब्ल्यूआरआई राॅस सेंटर के ग्लोबल निदेशक अनी दासगुप्ता ने कहा कि शताब्दी के मध्य तक शहरों में 2.5 अरब से ज्यादा लोग जुड़ जाएंगे। इसलिए असंगठित क्षेत्र के लोगों को परछाई वाली जिंदगी से निकाल कर मुख्यधारा में लाना होगा। इसी से बराबरी का माहौल उत्पन्न होगा और मानवता का भला होगा।

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