कानपुर। कहानी : कहानी वही पुरानी , गरीब लड़का, अमीर लड़की और लड़कपन का प्यार और प्यार के खिलाफ लड़की का परिवार, लड़का लड़की भागते हैं और फिर अपनी जान बचते पूरी फिल्म में दौड़ लगाते रहते हैं।

नए पैकेट में पुराना माल
जितना इस फिल्म में ईशान और जाह्नवी भागे हैं, उतना अगर ओलिंपिक में भागे तो देश के लिए मैराथन गोल्ड मेडल ले आए। आधी फिल्म तो सड़कों पर दौड़ते भागते बीत जाती है। क़यामक से कयामत तक की तरह ये फिल्म भी रजवाड़ों के प्रदेश में बेस्ड है इसलिए फिल्म के काफी हिस्से उसी फिल्म की याद दिलाते हैं। फिल्म कई जगह पे डगमगाती है, जैसे दोनों की लवस्टोरी ठीक से फ्रेम ही नहीं की गई, लड़की को लड़के से क्यों प्यार है, उसका कोई लॉजिकल कारण समझ नहीं आता। साथ ही दुश्मनी का ट्रैक भी क्लियर नहीं है, जो लड़के की तरफ से जातिवाद कहा जाता है और लड़की की तरफ से जातिवाद का जिक्र तक नहीं होता, फिल्म के कनफ्लिक्ट क्लियर नहीं हैं। दूसरी बड़ी समस्या है जाह्नवी के करैक्टर का ग्राफ, फर्स्ट हाफ खत्म होते ही एक दम से जाह्नवी का करैक्टर इल्लॉजिकल हो जाता है। एक दम से बोल्ड लड़की अबला नारी में कन्वर्ट हो जाती है। फिल्म के संवाद कहीं-कहीं पर काफी अच्छे हैं पर अजीब सी साउंड करती राजस्थानी डायलेक्ट से काफी संवाद अपना असर खो देते हैं। क्लियरली डायलॉग हिंदी में सोचे गए हैं, और कृत्रिम तरीके से उनको राजस्थानी टाच दिया गया है।

फर्स्ट हाफ सेकंड हाफ से बेहतर

फर्स्ट हाफ सेकंड हाफ से बेहतर है, सेकंड हाफ में फिल्म जैसे ही आती है, रायते की तरह फैल जाती है। फिल्म का गीत संगीत भी कुछ खास नहीं हैं। फिल्म का सबसे बड़ा माइनस पॉइंट है, इसका अजीब सा क्लाइमेक्स जो ज्यादातर दर्शकों को पसंद नहीं आएगा। इसकी एक झलक मुझे हॉल में पब्लिक के रिएक्शन से मिली।
dhadak movie review : नए पैकेट में पुराना सामान है जाह्नवी-ईशान की धड़क
जाह्नवी-ईशान की अदाकारी
ईशान इस फिल्म का सबसे बड़ा हाईपॉइंट हैं, मैंने 'बियॉन्ड द  क्लाउड्स' की समीक्षा में भी कहा था, कि ईशान एक बेहद टैलेंटेड परफॉर्मर हैं और इस फिल्म में भी मैं अपनी बात पे कायम हूं। उन्होंने अपना काम बखूबी किया है। किसी-किसी जगह पर वो लजावब हैं,खासकर फिल्म के क्लाइमेक्स में तो वो आपको अचंभित कर देते हैं। जाह्नवी भी टैलेंटेड हैं, उनसे कोई शिकायत नहीं है, बस मुझे ये लगता है की अभी वो पूरी तरह से तैयार नहीं हैं, लोग उनमे श्रीदेवी को तलाशते हैं और ये किसी भी लिहाज से लॉजिकल नहीं है। वो एक कच्चे मिटटी के बर्तन की तरह हैं, जो समय की आंच में ही पकेगा। तब तक उनसे ऊंची आशा रखना सही नहीं है। इसलिए उनका इवैल्यूएशन मैं उनकी नेक्स्ट फिल्म पे छोड़ता हूं। आशुतोष टॉप नॉच हैं पर जो दो लोग ईशान के दोस्तों का रोल प्ले कर रहे हैं, वो फिल्म के शोस्टॉपर हैं। सारे अच्छे मोमेंट उन्ही के पास हैं।

सैराट से तुलना

सैराट की तुलना में ये फिल्म काफी वीक है। सैराट बेहद क्लियर स्टोरीलाइन पे बानी हुई ज़मीनी पर फिर भी एक शानदार फिल्म थी। धड़क ग्लॉस में रंगी पुती हुई एक अधकचरी सी फिल्म है। सैराट में रिंकू का परफॉरमेंस अमेजिंग था, जिसके लिए नाबालिग रिंकू को राष्ट्रीय फिल्म पुरुस्कारों में स्पेशल मेंशन भी मिला था, जाह्नवी उनसे काफी पीछे हैं। सैराट का क्लाइमेक्स उसका सबसे बड़ा प्लस पॉइंट था, क्लाइमेक्स को बदलना 'धडक' की सबसे बड़ी भूल है। शशांक के फिल्म के आखरी एक मिनट में पूरी फिल्म का समझिये सत्यानाश ही कर दिया।

इसलिए जाएं देखने
मैं ये तो नहीं कहूंगा की धड़क देखने मत जाइये, ज़रूर जाइये। ईशान का काम काबिल-ए -तारीफ है। जाह्नवी में आपको श्रीदेवी की झलक भी दिखेगी। पर फिर भी, आप जब इस फिल्म को देख लें तो नागराज मंजुले की 'सैराट' ज़रूर देखिये। अगर मराठी आपको नहीं आती, कोई बात नहीं, सबटाइटल में समझने में ज्यादा दिक्कत नहीं होगी, और फिर मुझे कमेंट लिखकर आप बताएं की आपको कौन सी फिल्म बेहतर लगी।

Rating : 2 स्टार

Reviewed by : Yohaann Bhaargava
Twitter : yohaannn

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