कश्मीर में भारतीय सुरक्षा ठिकानों को चरमपंथियों के आत्मघाती हमलों का सामना करना पड़ रहा था. करगिल लड़ाई तो बड़ी जंग बनने से पहले ही बंद हो गई. लेकिन ग़ैर-कश्मीरी चरमपंथी सक्रिय हो गए और कश्मीर में हिंसा का ग्राफ़ बढ़ गया. बहुत कम लोगों को विश्ववास था कि अमरीका में हुए हमलों से कश्मीर के हालात बदल जाएंगे.

हुआ ये कि पाकिस्तान में उस वक़्त के फ़ौजी शासक जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने कश्मीर में सक्रिय चरमपंथियों के बारे में नीति बदल डाली और यहां के अलगाववादियों ने भी चरमपंथी नेताओं से किनारा कर लिया. पिछले 10 वर्षों से भिन्न-भिन्न चुनौतियों का सामना कर चुके यहां के अलगाववादी नेता कहते हैं कि 9/11 का सीधा लाभ भारत को पहुंचा है.

हुर्रियत कॉंफ़्रेंस के एक धड़े के अध्यक्ष मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ कहते हैं, "भारत सरकार ने 9/11 के बाद के हालात से फ़ायदा उठाने की कोशिश की. कश्मीर की तहरीक को दहशतगर्दी के साथ मिलाने की कोशिश की." उन्होंने कहा, "मैं समझता हूं कि उससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय की दिलचस्पी बहुत कम हो गई और उस दुर्घटना ने कश्मीर के आंदोलन पर काफ़ी नकारातमक प्रभाव डाला. और हमारी जायज़ मांग पर भारत सरकार किसी हद तक प्रश्न चिह्न लगाने में कामयाब रही."

शांतिपूर्ण आंदोलन के लाभ

मीरवाइज़ ने बीबीसी को बताया, "9/11 ने दुनिया भर में एक प्रभाव डाला और मैं समझता हूं कि कश्मीरी लोग देखने लगे कि एक शांतिपूर्ण आंदोलने के कितने लाभ हैं और उसकी कितनी मान्यता है और फिर कश्मीर के हवाले से तथ्य सामने आने लगे."

कश्मीर की नौजवान पीढ़ी मानव अधिकारों के बारे में काफ़ी भावुक नज़र आई है क्योंकि ये पीढ़ी हिंसा और ज़्यादतियों के बीच परवान चढ़ी है. लेकिन इनमें से बहुत सारे लोगों का मानना है कि 9/11 के बाद कश्मीर के जन आंदोलन से हिंसा का पहलू अलग हो गया इसकी वजह से युवकों को शिक्षा के अधिक मौक़े मिले.

कश्मीर विश्वविद्यालय की एक छात्रा इर्तिज़ा शफी ने कहा, "हालांकि मैं उन दिनों बहुत छोटी थी लेकिन मैंने यहां सिर्फ़ लाशें देखीं हैं, लोगों को मरते हुए देखा है, घर जलते हुए देखे हैं, हज़ारों पंडितों को घर से बेघर होते हुए देखा है." उन्होंने फिर कहा, "फिर 9/11 आया तो चरमपंथियों में डर पैदा हुआ, दहशत पैदा हुई. आहिस्ता-आहिस्ता उनके दायरे छोटे होते गए और अंत में वे ख़त्म हो गए. उससे ये हुआ कि हमारी शिक्षा को ताक़त मिली. तो कहा जा सकता है कि यह कश्मीर के लिए अच्छी चीज़ थी." लेकिन ज़्यादातर नौजवानों का कहना है कि 9/11 के बाद पूरी दुनिया के मुसलमान शक़ के दायरे में आ गए. कश्मीर विश्वविद्यालय और दूसरे बड़े शिक्षा संस्थानों के छात्रों ने अपनी राय इन शब्दों में व्यक्त की.

शक के दायरे में

कश्मीर विश्वविद्यालय की एक छात्रा इर्तिज़ा शफी ने कहा, "हालांकि मैं उन दिनों बहुत छोटी थी लेकिन मैंने यहां सिर्फ़ लाशें देखीं हैं, लोगों को मरते हुए देखा है, घर जलते हुए देखे हैं, हज़ारों पंडितों को घर से बेघर होते हुए देखा है."

उन्होंने फिर कहा, "फिर 9/11 आया तो चरमपंथियों में डर पैदा हुआ, दहशत पैदा हुई. आहिस्ता-आहिस्ता उनके दायरे छोटे होते गए और अंत में वे ख़त्म हो गए. उससे ये हुआ कि हमारी शिक्षा को ताक़त मिली. तो कहा जा सकता है कि यह कश्मीर के लिए अच्छी चीज़ थी." लेकिन ज़्यादातर नौजवानों का कहना है कि 9/11 के बाद पूरी दुनिया के मुसलमान शक़ के दायरे में आ गए. कश्मीर विश्वविद्यालय और दूसरे बड़े शिक्षा संस्थानों के छात्रों ने अपनी राय इन शब्दों में व्यक्त की.

शक के दायरे में

9/11 के बाद का दशक कश्मीर में घटनापूर्ण रहा. 2002 के चुनाव में अलगाववादियों के बहिष्कार के बावजूद लोगों ने हिस्सा लिया. 2005 में भयानक भूकंप आया जिसमें कई गांव उजड़ गए. 2006 में फ़र्ज़ी झड़पों का मामला सामने आया और 2008 में हिंसा की जगह अहिंसक विरोध ने ले ली.

अधिकांश विशेषज्ञों का कहना है कि 9/11 के बाद पाकिस्तान की कश्मीर नीति में परिवर्तन आया, तो यहां अहिंसक प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हुआ. लेकिन कुछ विशेषज्ञों को लगता है कि इन अहिंसक प्रदर्शनों का भी कोई हल न निकला तो हालात कोई ख़तरनाक मोड़ ले सकते हैं.

वरिष्ठ विशेषज्ञ डॉक्टर शेख शौकत हुसैन का भी यही मानना है, "चूंकि चरमपंथी आंदोलन को नकारात्मक तौर से देखा जाने लगा तो कश्मीरियों ने अपने आंदोलन को अहिंसक रूप दे दिया और 2008 के बाद ये स्पष्ट है कि कश्मीर का आंदोलन चरमपंथ के अलावा भी चल सकता है और चल रहा है."

उन्होंने आगे कहा, "हिंदुस्तान या अमरीकियों के पास इसके अलावा कोई औचित्य नहीं होना चाहिए कि वह इन आंदोलनों का जवाब सकारात्मक अंदाज़ में दे दें."

शौकत हुसैन ने कहा, "लेकिन दुर्भाग्य से कही भी ऐसा नहीं हो रहा है. कहीं ऐसा न हो कि कश्मीरी शांतिपूर्ण आंदोलन से भी मायूस होकर फिर हिंसा की और आ जाएं."

9/11 के बाद अहिंसा का जो चलन शुरू हुआ वह अभी जारी है, लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि कश्मीर पर 9/11 के प्रभाव का सही अंदाज़ा तब होगा, जब नेटो सेना अफ़ग़ानिस्तान छोड़ कर चली जाएंगी क्योंकि अफ़ग़ानिस्तान के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच हो रही दौड़ में कश्मीर एक महत्वपूर्ण तत्व है.

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